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यूपी के ‘बुलडोज़र जस्टिस’ को ख़त्म करने के लिए सीजेआई करें हस्तक्षेप, पूर्व नौकरशाहों ने लगाई गुहार

Published On :    24 Jun 2022   By : MN Staff
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यूपी में तोड़फोड़ अभियान और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए म्युनिसिपल व नागरिक कानूनों का दुरुपयोग प्रशासन और पुलिस प्रणाली को क्रूर बहुसंख्यक दमन के साधन में तब्दील करने की एक बड़ी नीति का सिर्फ एक अंश है.



नई दिल्ली : भाजपा की सस्पेंड पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा मोहम्मद पैगंबर पर विवादित टिप्पणी के बाद उनकी गिरफ्तारी की मांग के लिए हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए थे. इसके बाद खासकर यूपी में प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों के घर को बुलडोजर चलाकर जमींदोज कर दिया गया. अब ऐसे कार्रवाई को रोकने के लिए भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमना को पूर्व नौकरशाहों के एक समूह ने मंगलवार को पत्र लिखा है. उन्होंने पत्र में यूपी में चल रही बुलडोजर कार्रवाई के मामले में दखल देने की मांग की है. उन्होंने चीफ जस्टिस से गुहार लगाई कि वे ‘बुलडोजर द्वारा किए जा रहे न्याय’ के मामले में हस्तक्षेप कर इस कवायद को समाप्त करें. उन्होंने कहा कि यह चलन अब अपवाद के बजाय कई राज्यों में आम होता जा रहा है.


कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (सीसीजी) का हिस्सा 90 पूर्व लोक सेवकों ने सीजेआई के नाम लिखे खुले पत्र में कहा है कि पैगंबर मोहम्मद पर भाजपा प्रवक्ताओं की टिप्पणियों के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद उत्तर प्रदेश में ‘अवैध हिरासत, बुलडोजर से लोगों के मकान गिराने और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की हिंसा’ का सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए. हस्ताक्षर करने वालों में जीके पिल्लई, सुजाता सिंह, जूलियो रिबेरो, अविनाश मोहनाने, मैक्सवेल परेरा व एके सामंत और अनीता अग्निहोत्री शामिल हैं.


पत्र में कहा है, यूपी में तोड़फोड़ अभियान और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए म्युनिसिपल व नागरिक कानूनों का दुरुपयोग प्रशासन और पुलिस प्रणाली को क्रूर बहुसंख्यक दमन के साधन में तब्दील करने की एक बड़ी नीति का सिर्फ एक अंश है. पूर्व अधिकारियों ने दावा किया कि किसी भी विरोध को बुरी तरह कुचलने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 और यूपी गैंगस्टर व असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम-1986 लगाने के स्पष्ट निर्देश हैं.


पत्र में कहा गया है, ‘इस नीति को सरकार के शीर्ष स्तर से मंजूरी प्राप्त है जबकि शक्तियों के निरंकुश व मनमानी इस्तेमाल के लिए स्थानीय स्तर के अधिकारी और पुलिसकर्मी निस्संदेह जवाबदेह होते हैं, इसलिए वास्तविक दोष राजनीतिक कार्यपालिका के शीर्ष स्तर में निहित है. यह संवैधानिक शासन के ढांचे का वह भ्रष्टाचार है जिसके लिए जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट आगे आकर इसके अधिक फैलने से पहले इसके खिलाफ कार्रवाई करे.


यह भी पढ़ें : सार्वजनिक जगह जातिसूचक दुर्व्यवहार हुआ तभी एससी/एसटी कानून लागू होगा, कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला  


इसमें आगे कहा गया है, ‘इससे भी ज्यादा चिंताजनक ‘बुलडोजर न्याय’ का विचार है, जिसके तहत जो नागरिक कानूनी तरीके से विरोध करने या सरकार की आलोचना करने या कानूनी तरीके से असंतोष व्यक्त करने का साहस करने वालों को कठोर सजा दी जाती है. यह कई भारतीय राज्यों में अब अपवाद के बजाय आम होता जा रहा है.’ पूर्व नौकरशाहों का कहना है कि समस्या अब केवल स्थानीय स्तर पर पुलिस और प्रशासन की ज्यादतियों की नहीं है बल्कि तथ्य यह है कि कानून के शासन, उचित प्रक्रिया, दोषी न साबित होने तक निर्दोष माने जाने के विचार को बदला जा रहा है.


उन्होंने कहा, ‘हमने प्रयागराज, कानपुर, सहारनपुर और अन्य शहरों, जहां बड़ी मुस्लिम आबादी है, में देखा है कि एक पैटर्न का पालन किया जाता है और वह राजनीतिक रूप से निर्देशित होता है.’ सीसीजी ने कहा कि यह दंड से मुक्ति का भाव और बहुसंख्यक सत्ता का अहंकार है जो संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों की इस अवहेलना के अभियान को चलाता प्रतीत होता है.


पूर्व 90 लोक सेवकों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया, ‘हम मानते हैं कि जब तक उच्चतम स्तरीय न्यायपालिका हस्तक्षेप करने के लिए आगे नहीं आती है, तब तक पिछले बहत्तर सालों में इतनी सावधानी से निर्मित संवैधानिक शासन की पूरी इमारत ढहने की संभावनाएं हैं. पूर्व लोकसेवकों ने 14 जून 2022 को सीजेआई को भेजी उस याचिका का भी समर्थन किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के पूर्व जजों और प्रमुख वकीलों के किसी समूह ने उनसे उत्तर प्रदेश में हाल की कार्रवाईयों का स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया था.



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