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सार्वजनिक जगह जातिसूचक दुर्व्यवहार हुआ तभी एससी/एसटी कानून लागू होगा, कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

Published On :    24 Jun 2022   By : MN Staff
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जब आरोपी ने सार्वजनिक तौर पर अपमानित करने के लिए दुर्व्यवहार किया हो. कोर्ट ने कहा कहीं भी यह स्पष्ट नहीं है कि जब आरोपी ने तहखाने में गालियां दी थीं, तब वहां पीड़ित व सहकर्मियों के अलावा कोई और भी मौजूद था.



बेंगलुरु : कर्नाटक हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट को लेकर हैरान करने वाला फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने कहा है कि जातिसूचक दुर्व्यवहार सार्वजनिक स्थान पर होना चाहिए. तभी एससी/एसटी एक्ट लागू होगा. अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ लंबित मामले को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि एक इमारत के तहखाने में दुर्व्यवहार किया गया था, जहां सिर्फ पीड़ित और उसके सहकर्मी ही मौजूद थे.


कोर्ट ने कहा कि कानून के मुताबिक अधिनियम के तहत तभी सजा दी जा सकती है, जब आरोपी ने सार्वजनिक तौर पर अपमानित करने के लिए दुर्व्यवहार किया हो. कोर्ट ने कहा कहीं भी यह स्पष्ट नहीं है कि जब आरोपी ने तहखाने में गालियां दी थीं, तब वहां पीड़ित व सहकर्मियों के अलावा कोई और भी मौजूद था. इमारत का तहखाना सार्वजनिक स्थान नहीं था और गाली देते समय वहां कोई अन्य व्यक्ति मौजूद नहीं था. इस वजह से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति संशोधन अधिनियम, 2015 के तहत सजा नहीं दी जा सकती.


वर्ष 2020 में कथित घटना में रितेश पायस ने एक इमारत के तहखाने में मोहन को जातिसूचक गाली दी, जहां वह अन्य लोगों के साथ काम करता था. सभी कर्मियों को भवन मालिक जयकुमार नायर ने काम पर रखा था. जस्टिस एम नाग प्रसन्ना ने अपने फैसले में कहा, ‘उपरोक्त बयानों से दो कारक सामने आएंगे- एक यह है कि इमारत का तहखाना सार्वजनिक स्थल नहीं था और दूसरा, अन्य व्यक्ति जो वहां मौजूद होने का दावा करते हैं, वे केवल शिकायतकर्ता के मित्र थे.


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अदालत ने कहा, सार्वजनिक स्थान पर अपशब्द नहीं कहे गए जो मौजूदा मामले में अधिनियम को लागू करने के लिए उपलब्ध नहीं हैं.’ अदालत ने कहा कि आरोपी रितेश पायस का भवन मालिक जयकुमार नायर से विवाद था और उसने भवन निर्माण के खिलाफ स्थगन ले रखा था.


अदालत ने कहा कि दोनों के बीच विवाद के मुद्दे को खारिज नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह घटनाओं की शृंखला में एक स्पष्ट कड़ी को प्रदर्शित करता है. इसलिए, अपराध का पंजीकरण ही प्रामाणिकता की कमी से ग्रस्त है. पायस पर आईपीसी की धारा 323 के तहत भी आरोप लगाया गया है. हाईकोर्ट ने इन आरोपों को भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आईपीसी की धारा 323 के तहत दंडनीय अपराध के लिए तकरार में चोट लगी होनी चाहिए.


हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मोहन का घाव प्रमाणपत्र हाथ के अगले हिस्से पर एक साधारण खरोंच का निशान और छाती पर एक और खरोंच का निशान दिखाता है. रक्तस्राव का संकेत नहीं है. इसलिए, साधारण खरोंच के निशान आईपीसी की धारा 323 के तहत अपराध नहीं हो सकते हैं.



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