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एनआरसी : हैदर अली को फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने किया था विदेशी घोषित, हाईकोट ने पलटा फैसला, बताया भारतीय नागरिक

Published On :    28 Apr 2021   By : MN Staff
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19 लाख से अधिक लोगों को एनआरसी यानी नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया है. अब इन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए इसी ट्रिब्यूनल में ही जाना होगा.



गुवाहाटी: असम के बारपेटा की फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने 2019 में हैदर अली को विदेशी नागरिक घोषित कर दिया था. लेकिन, क़रीब दो साल बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूलन के फैसले को पलटाते हुए उन्हें भारतीय नागरिक बताया है. हाईकोर्ट ने हैदर अली के मामले पर सुनवाई के बाद एफ़टी के आदेश को रद्द करते हुए उनके नाम के आगे लगाए गए विदेशी टैग को हटाने का निर्देश दिया है.


बीबीसी हिंदी के अनुसार, जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह और जस्टिस मनीष चौधरी की अदालत ने 30 मार्च 2021 को अपने फ़ैसले में कहा, हमारा दृढ़ मत है कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में सक्षम हैं कि उनके पिता हरमुज अली थे और उनके दादा नादू मिया थे. दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता का अपने पिता हरमुज अली और दादा नादू मिया के साथ संबंध बताया गया है और इसके अनुसार, हमें यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि याचिकाकर्ता एक भारतीय नागरिक हैं न कि कोई विदेशी है.


मालूम हो कि प्रदेश में 19 लाख से अधिक लोगों को एनआरसी यानी नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया है. अब इन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए इसी ट्रिब्यूनल में ही जाना होगा. ट्रिब्यूनल के कामकाज पर काफ़ी पहले से सवाल उठ रहे हैं और हैदर अली के इस मामले से राज्य में एक बार फिर नागरिकता साबित करने का यह मुद्दा गंभीर हो गया है.


बारपेटा ज़िले में सरथेबारी थाना क्षेत्र के निवासी हैदर अली साल 2002 में घर की माली हालत के कारण पढ़ाई छोड़ कर दिल्ली चले गए थे. गांव में उनके पिता, मां और छोटे चार भाई रहते है. हैदर के नाम पर फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में मामला चलने की वजह से उनके पूरे परिवार का नाम एनआरसी में शामिल नहीं किया गया. हैदर ट्रिब्यूनल में हुई परेशानी पर कहते हैं, साल 2018 मेरे छोटे भाई ने फ़ोन पर बताया कि फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल से नोटिस आया है तो मैं तुरंत गांव चला गया.


जब एफ़टी कोर्ट में हाज़िर हुआ तो तमाम दस्तावेज़ होने के बाद भी वे 1971 के पहले की मतदाता सूचियों में हमारे चाचा, फूफा सभी रिश्तेदारों के साथ संबंध स्थापित करने की बात कहने लगे. जबकि मैंने अपने पिता और दादा के साथ संबंध से जुड़े दस्तावेज़ के तमाम लिंकेज विदेशी ट्रिब्यूनल को दिए थे फिर भी उन्होंने मुझे विदेशी नागरिक घोषित कर दिया. हैदर ने कहा, एफ़टी के इस फ़ैसले से मेरा पूरा परिवार दहशत में आ गया था. हम भारतीय होते हुए भी अपनी नागरिकता को लेकर घिर गए थे.


एफ़टी के फ़ैसले के बाद हैदर मामले को निचली अदालत ले गए वहां भी उन्हें विदेशी ही घोषित किया गया. वो कहते हैं, निचली आदालत में मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था. क्योंकि मेरे वकील ने वंशावली से संबंधित दस्तावेज़ सही तरीक़े से अदालत के सामने नहीं रखा. फिर हम गुवाहाटी हाई कोर्ट गए. हैदर कहते है, मुझे कई बार संदेह होता है कि एफ़टी में मेरे साथ ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं. ज्यादातर मुसलमानों के साथ ही ऐसी परेशानी हो रही है.


हैदर अली के वकिल एम.जे. क़ादिर के अनुसार, जिन लोगों को डी-वोटर यानी संदिग्ध बनाया गया था उन लोगों के मामले अब ट्रिब्यूनल को भेजे जा रहे हैं. वह कहते हैं, हैदर अली के मामले में बरपेटा ट्रिब्यूनल को जो 1966 से पहले का इलेक्टोरल रोल दिया गया था उसमें उसके दादा और चाचा के नाम थे, लेकिन वहां हैदर ने लिखित बयान में परिवार के बाक़ी रिश्तेदारों की स्पष्ट जानकारी नहीं देने पर उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया. 


इस पर हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा, उन सभी व्यक्तियों की कड़ी को साबित करना आवश्यक नहीं है जो पिता या दादा के साथ जुड़े रिश्तों से ताल्लुक़ रखते हैं. अर्थात अन्य व्यक्तियों के बारे में उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है. हाईकोर्ट ने इसी बिंदू पर हस्तक्षेप किया और अपना फ़ैसला सुनाया.


क़ादिर गुवाहाटी हाईकोर्ट में नागरिकता से जुड़े क़रीब 10 मामले लड़ रहे हैं. वह बताते हैं कि कई मामलों में लोगों के नाम, उपनाम और उम्र में मामूली-सी ग़लती के कारण भी उन्हें विदेशी घोषित कर दिया जाता है. जबकि इस संदर्भ में गुवाहाटी हाईकोर्ट के फ़ैसले में ट्रिब्यूनल को विचार करने का सुझाव दिया गया है. 


लेकिन, हैदर अली का यह ऐसा मामला है जिसमें हाईकोर्ट ने उन्हें भारतीय घोषित किया है. वह कहते है, असल में ट्रिब्यूनल व्यवस्था के तहत एफ़टी में नियुक्त सदस्य विदेशी अधिनियम,1946 के अंतर्गत यह देखता है कि जिस व्यक्ति पर मामला है वो इस क़ानून के भीतर विदेशी है या नहीं है. लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में विदेशी ट्रिब्यूनल के कामकाज की आलोचना होती रही है. ऐसे आरोप भी लगे कि ट्रिब्यूनल में काम करने वाले सदस्य सरकार के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर अपना काम करते हैं वरना उन्हें वहां से हटा दिया जाता है.


हैदर अली कहते हैं कि सरकार को ट्रिब्यूनल व्यवस्था ही ख़त्म कर देनी चाहिए. इस व्यवस्था में लोगों को एफ़टी के चक्कर काटने पड़ रहें है. अगर किसी की नागरिकता पर संदेह है तो घर-घर जाकर उसकी जाँच की जाए और उसका फ़ैसला अदालत करे.



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