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लागत से भी कम कीमत : सड़कों और नहरों में टमाटर फेकने को मजबूर किसान

Published On :    10 Apr 2021   By : MN Staff
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इस साल 4 एकड़ में टमाटर की फसल लगाई है. टमाटर की फसल अच्छी है, लेकिन जो रेट सोचा था नहीं मिल रहा. फसल लगाने में डेढ़ लाख रुपए का खर्चा भी आया.



नई दिल्ली : इस साल 4 एकड़ में टमाटर की फसल लगाई है. टमाटर की फसल अच्छी है, लेकिन जो रेट सोचा था नहीं मिल रहा. फसल लगाने में डेढ़ लाख रुपए का खर्चा भी आया. लगा था कि चार से पांच लाख रुपए का व्यापार हो जायेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह उन किसानों का कहना है जिन्होंने लागत ज्यादा लगाई मगर लागत की भी कीमत नहीं निकल पाई. 


किसान बताते हैं कि टमाटर खरीदने वाले व्यापारी नहीं आ रहे हैं. मंडियों में गाड़ियां खड़ी हैं कोई माल उतारने को तैयार नहीं है. लॉकडाउन का माहौल बन रहा है तो सब नुकसान में चल रहा है. इसलिए हमने एक अप्रैल को टमाटर फेंक दिया, जो कीमत मिल रही थी उससे किराया तक नहीं निकल पा रहा था.


ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब किसानों को उनकी फसल की सही कीमत नहीं मिल रही है. आलू, प्याज और टमाटर को लेकर तो अक्सर होता है. पिछले साल मई में भी टमाटर की कीमत 50 पैसे प्रति किलो तक पहुंच गई थी. मध्य प्रदेश में प्याज के सीजन के समय भी कीमत गिर जाती है और एक समय ऐसा भी आता है जब यही टमाटर, प्याज बाजार में उपभोक्ताओं को 100-200 रुपए किलो में खरीदना पड़ता है, लेकिन किसानों को इसका फायदा न के बराबर ही मिलता है.


गौरतलब है कि मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग ने सब्जियों और फलों का अनुमानित ब्यौरा तैयार किया है. इसके अनुसार पिछले पांच सीजन में केवल एक साल ही सर्वाधिक बढ़ोतरी हुई है. आंकड़ों के अनुसार टमाटर की बात करें तो सीजन 2015-16 से लेकर 2019-20 तक में सर्वाधिक उत्पादन सीजन 2018-19 में 29.46 फीसदी प्रति हेक्टेयर रहा. 



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इस वर्ष 85412.36 हेक्टेयर क्षेत्रफल में उत्पादन लिया गया. हालांकि यह क्षेत्रफल सीजन 2015-16 से कम था. तब 95395.42 हेक्टेयर था. आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में उत्पादकता 25.71 फीसदी प्रति हेक्टेयर, 2016-17 में 25. 33, 2017-18 में 24. 53 और 2019-20 में 29.19 फीसदी प्रति हेक्टेयर रहा. यह पिछले सीजन से 0.27 फीसदी कम है.


उत्तर प्रदेश में भी टमाटर की कीमत गिरी
उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव सहित अन्य जिलों में भी टमाटर के भाव गिरे हुए हैं. उन्नाव सदर तहसील क्षेत्र के बलऊ खेड़ा गांव के किसान बताते हैं कि इस बार एक बीघे में टमाटर की खेती की थी. लेकिन, बाजार भाव अच्छा न रहने के चलते टमाटर की खेती में कोई फायदा नहीं हो रहा. हमारे खेत में हर तीसरे दिन 25 कैरेट (लगभग डेढ़ कुंतल) टमाटर निकलता था. व्यापारी अभी एक कैरेट (25 किलो) के लिए लगभग 100 रुपए दे रहे हैं. जबकि, खेत से टमाटर तुड़वाने के लिए चार से पांच मजदूर लगाने पड़ते थे, जिन्हें 1,000 रुपया देना पड़ता था. अब आप बताओ कि हमने टमाटर से क्या कमाया?


यही हाल सीतापुर का भी है. उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के महोली विकास खण्ड में टमाटर की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. यहां से देश के अलग अलग राज्यो में रोजाना दर्जनों ट्रक टमाटर सप्लाई किया जाता है, लेकिन इस बार कोविड-19 के चलते सहालग न होने के कारण टमाटर की खेती करने वाले किसानों को बहुत ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है. 


अगर देश की राजधानी नई दिल्ली की बात करें तो सबसे बड़ी मंडी आजादपुर सब्जी मंडी में आढ़ती मोहम्मद आरिफ ने बताया अभी टमाटर की कीमत डेढ़ से दो रुपए प्रति किलो है. मई आते-आते कीमत एक बार फिर एक रुपए के नीचे पहुंच जायेगी. उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर और बरेली जिले में भी टमाटर की खेती करने वाले किसान परेशान हैं. बाईगूल नदी से कुछ दूर बसे बरेली के उचसिया गांव में टमाटर की खेती करने वाले किसान बताते हैं इस बार टमाटर का रेट तीन से चार गुना तक नीचे हो गया है.



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बता दें कि आलू, प्याज और टमाटर की कीमत अक्सर सीजन में कम हो जाती है. इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने ‘टॉप्स’ यानी टमाटर, प्याज और आलू को प्राथमिकता देने की बात कही थी. इसलिए ऑपरेशन ग्रीन की शुरुआत हुई, जिसमें बाद में 22 जल्दी खराब होने वाले उत्पादों को शामिल किया गया. केंद्र सरकार की टॉप (टोमेटो, ओनियन व पोटैटो) स्कीम के तहत कोल्ड स्टोरेज, कोल्ड चेन और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को प्रोत्साहन देने की योजना थी.


सरकार ने 2018-19 के बजट भाषण में ऑपरेशन ग्रीन के लिए 500 करोड़ रुपए की घोषणा की थी। इसमें प्रमुख टमाटर उत्पादक राज्य, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात और तेलंगाना, प्रमुख प्याज उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, बिहार और प्रमुख आलू उत्पादक राज्य, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब को प्रोडक्शन क्लस्टर क्षेत्र बनाया गया है, लेकिन इतने सालों के बाद अभी प्याज, टमाटर और आलू की कीमत अक्सर बहुत कम हो जा रही है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है.



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