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मुझे रिहा कर दिया गया तो अंग्रेजी सरकार का रहूंगा वफादार, आझादी की लड़ाई छोड़ दुंगा

Published On :    19 Sep 2019   By : MN Staff
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सावरकर ने लगाई थी माफी की गुहार, सावरकर ने कहा है, दो-राष्ट्र सिद्धांत पर श्री जिन्ना के साथ मेरा कोई झगड़ा नहीं है. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं. यानी सावरकर भी हिन्दू- मुसलमान के बीच फूट डालो और दो देश बनाकर राज करो सिद्धांत के सहायक रहे हैं.



नई दिल्ली :  देश में हिन्दुत्व (ब्राह्मणवाद) के नाम का जहरिला बिज बोने वाले विनायक दामोदर सावरकर एक बार फिर विवादों में घिरे हुए हैं. देश का कोई भी बहुजन उन्हे राष्ट्रवादी नही मानता. सावरकर का गुणगान करने वाली कांग्रेस भी अब उन्हें राष्ट्रवादी मानने से इनकार कर रही हैं. जब की सावरकर कभी भी राष्ट्रवादी नही थे. 



कांग्रेसने लिखा है कि सावरकर को दो राष्ट्र सिद्धांत से कोई आपत्ति नहीं थी. सावरकर का एक रिकॉर्ड कांग्रेस ने शेयर किया है, जिसमें सावरकर ने कहा है, दो-राष्ट्र सिद्धांत पर श्री जिन्ना के साथ मेरा कोई झगड़ा नहीं है. 



हम हिंदू (वैदिक) अपने आप में एक राष्ट्र हैं और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं. यानी सावरकर भी हिन्दू- मुसलमान के बीच फूट डालो और दो देश बनाकर राज करो सिद्धांत के सहायक रहे हैं. जबकि संघ और उसके समर्थक इससे इनकार करते रहे हैं.



प्रकाशन विभाग से साल 1975 में प्रकाशित आरसी मजूमदार की किताब ‘पीनल सेटलमेंट्स इन द अंडमान्स’ के मुताबिक साल 1911 में जब सावरकर को क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते कालेपानी की सजा सुनाई गई थी और अंडमान-निकोबार के सेलुलर जेल में भेजा गया था, तब सावरकर ने सजा शुरू होने के कुछ महीने बाद ही अंग्रेजी हुकूमत से रिहाई की गुहार लगाई थी. 



शुरू में सावरकर ने 1911 में अंग्रेजी सरकार को चिट्ठी लिखी, बाद में सावरकर ने जेल सुप्रीटेंडेंट के जरिए 1913 और 1921 में याचिका दाखिल की थी. अपनी याचिका में सावरकर ने साफ तौर पर लिखा था कि मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं भारत की आजादी की लड़ाई छोड़ दूंगा और अंग्रेजी हुकूमत के प्रति वफादार रहूंगा.



सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भी सावरकर पर अपने विचार प्रकट किए हैं. उन्होंने लिखा है, सावरकर 1910 ईस्वी तक ही राष्ट्रवादी थे. यह वह दौर था जब वो गिरफ्तार किए गए थे और कालेपानी की सजा पाई थी. 



बतौर काटजू, जेल में 10 साल गुजारने के बाद अंग्रेजों की तरफ से सावरकर को प्रस्ताव मिला था कि वो सरकार के सहयोगी बन जाएं जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया था. उन्होंने लिखा है कि सेललुलर जेल से छूटने के बाद सावरकर हिन्दू साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के काम में जुट गए थे.



बता दें कि हाल के दिनों में वीर सावरकर को लेकर राजनीतिक पार्टियां आमने-सामने हैं. शिव सेना चीफ उद्धव ठाकरे ने कहा है कि अगर सावरकर इस देश के प्रधामंत्री होते तो पाकिस्तान का जन्म नहीं होता. इसके साथ ही उद्धव ठाकरे ने अंग्रेजों से माफी मागने वाले सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की है. इसके जवाब में कांग्रेस ने पुराना ऐतिहासिक दस्तावेज शेयर कर निशाना साधा है.


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