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शेगाँव में बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क का विशाल सम्मेलन

Published On :    19 Sep 2019   By : MN Staff
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भोन स्तूप बचाने के लिए देश भर में ताकत खड़ी करेंगे : वामन मेश्राम



शेगाँव :  बुलढाना जिले के शेगाँव में मौय सम्राट राजा अशोक ने बनाया हुआ बुद्धकालिन भोन स्तूप बचाने के लिए पूरे देशभर में लोगों को जागरूक कर ताकत खड़ी करेंगे. ऐसा एलान बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने किया. 



उन्होंने बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क द्वारा बुलढाना जिले के शेगाँव में आयोजित भोन स्तूप बचाओ सम्मेलन में यह बात कही. उन्होंने बताया कि तथागत गौतम बुद्ध और सम्राट अशोक के काल के स्तूपों के विनाश के पीछे कैसे ब्राह्मणी साजिश रची जा रही है, इसका भंडाफोड़ किया. 



आज की तारीख में महाराष्ट्र में बुद्धिस्टों की संख्या केवल 1 प्रतिशत है और एक प्रतिशत लोग इस स्तूप को बचाने में कामयाब नहीं हो सकते हैं. 



अगर, मौर्यकालीन इस भोन स्तूप को बचाना है तो अन्य जातियों के समूह के लोगों को जागृत करना होगा. और जागृत कर उनका समर्थन हासिल करना होगा तभी हम इस भोन स्तूप को बचा सकते हैं.



बुद्ध और सम्राट अशोक की विरासत ब्राह्मणवादी ताकतें कैसे नष्ट कर रही है? इस बात की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि सम्राट अशोक का पोता सम्राट राजा बृहद्रथ की हत्या पुष्यमित्र शुंग नाम के ब्राह्मण ने की. 



हत्या के बाद, पुष्यमित्र शुंग वाराणसी से फैजाबाद आया और फैजाबाद में जो साकेत नगर नामक बौद्ध केंद्र था, उस केन्द्र का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया. जो अयोध्या के आस-पास की भूमि है वह बौद्ध लोगों की भूमि है. वहाँ पर आज भी बुद्धकालीन अवशेष मिलते हैं. 



अगर, ऐसा है तो 2.4 बीधा जमीन अलग कैसे हो सकती है? अयोध्या की जो विवादित जमीन है वह राम जन्म भूमि कैसे हो सकती है? ऐसा सवाल भी उन्होंने खड़ा किया. उन्होंने कहा ब्राह्मण लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं. 



सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद बौद्ध भिक्खुओं की सामुहिक हत्याएं करवायी गई. अपनी जान बचाने के लिए कुछ भिक्खु तिब्बत जैसे देशों में निकल गये और वहाँ पर बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार किया.



वामन मेश्राम ने कहा कि जब जवाहरलाल नेहरू प्रधान मंत्री पद पर आसिन थे तब उन्होंने खुदाई पर प्रतिबंध लगा दिया. क्योंकि इस खुदाई से जो अवशेष मिले, वे सभी बुद्ध काल के थे. आज देश के अधिकांश स्तूपों और मठों पर ब्राह्मणों का कब्जा है. 


जगन्नाथपुरी बौद्ध विहार था, उस पर भी ब्राह्मणों ने कब्जा किया. सारा भारत बुद्ध का है इस तरह के पुरातात्विक साक्ष्य मिल रहे हैं. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा कि सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान, भारत की जीडीपी 31 प्रतिशत थी. 


इसका मतलब है कि हमारी विरासत पिछड़ी नहीं, बल्कि वंशानुगत थी. हम महान वंशजों के उत्तराधिकारी हैं. वामन मेश्राम ने आगे कहा कि महाराष्ट्र में राजवाडे नाम के ब्राह्मण ने कहा है कि नाग लोगों ने महाराष्ट्र की स्थापना की है. क्या ब्राह्मणों ने कभी नागपंचमी का त्योहार मनाया है? ऐसा सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यह त्योहार यहाँ के नाग लोगों द्वारा मनाया जाता है.



वामन मेश्राम ने कहा, राष्ट्रपिता जोतिराव फुले के अनुयायी केशवराव जेडे और दिनकर राव जवलकर थे. जेधे के घर के सामने आज भी नाग मंदिर है. इसका अर्थ मराठा लोग भी नागवंशीय हैं. मौर्य का मराठी अपभ्रंस मोरे हुआ. 


आज भी कई मराठा लोगों के सरनेम में ‘मोरे’ सरनेम दिखाई देता है. हमारे पास विकासशील राज्य संस्थानों की विरासत है. बुद्ध का प्रभाव अफगानिस्तान तक था. लेकिन, ब्राह्मणों द्वारा बंटवारा करने के बाद देश सीमाएं सीमित हो गयी है. 


यही वजह है कि इतिहास और बुद्ध की विरासत के साथ लोगों को जोड़ना होगा और भोन स्तूप बचाने के लिए ताकत पूरे देशभर में खड़ी करनी होगी. ऐसा कहते हुए उन्होंने कहा कि बुद्ध गया भी ब्राह्मणों के कब्जे में है. वह भी ब्राह्मणों के कब्जों से मुक्त करना होगा. ब्राह्मणों के साथ दांव पेंच से लड़ाई लड़नी होगी.




यूनिटी नीड्स- चंद्रमुनी महाथेरो

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए, बुद्धिस्ट इंटरनेशनल एसोसिएशन म्यांमार के चंद्रमुनि महाथेरो ने कहा कि 12वीं शदी में भारत में बौद्ध धम्म बार के देशों में चला गया और श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड और कंबोडिया इन देशों में बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार किया गया. लेकिन, उसी दौरान भारत में बौद्ध धम्म को खत्म करने का काम किया गया. 


भोन स्तूप को ही बचाने का काम न करते हुए महाराष्ट्र और भारत में जितने भी विहार स्तूप है उसे बचाया जाना चाहिए. अगर दुनिया में बुद्धिजम खत्म हो गया तो शांति नहीं होगी. प्रज्ञा, शील, करूणा बहुत महत्वपूर्ण हैं, इसलिए एकता की आवश्यकता है. 


यदि समाज से एकता को समाप्त कर दिया जाता है, तो किसी भी देश को बर्बाद होने में समय नहीं लगेगा. एकता बनाये रखने के लिए सख्त कदम उठाए जाने की जरूरत पर बल देते हुए उन्होंने अपनी बात समाप्त की.


♦ ब्राह्मणों द्वारा मिटाए जाने के बावजूद चीनी बौद्धों ने भारत के बौद्धों का इतिहास लिखा : प्रो विलास खरात


बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क द्वारा आयोजित सम्मेलन में अपनी बात रखते हुए प्रो.विलास खरात ने कहा कि चीनी दार्शनिक ह्वेनसांग और फाॉयान छठीं शताब्दी में भारत आए थे. यहाँ आकर उन्होंने संशोधन किया और बुद्ध की विरासत को जीवित करने का काम किया. भले ही ब्राह्मणों ने इतिहास को मिटा दिया हो, लेकिन चीनी बौद्धों ने वो इतिहास लिखकर रखा. 



इसलिए, इतिहास की गहन जानकारी मिल रही है. उन्होंने कहा कि पूना स्थिति डेक्कन कॉलेज के बीडी नेवतारे ने सन् 2002 में पूर्णा नदी के पास कुछ अवशेषों की खुदाई की थी. बाढ़ के कारण वहाँ की ईंटें बाहर आ गई थीं. 



खुदाई में निकली चीजें उन्होंने लखनऊ स्थित प्रयोगशाला में भेजी. उन वस्तुओं की उम्र हजारों साल पहले होने की बात सामने आयी. सम्राट अशोक बुलढाणा में आये थे. यहाँ पर उन्होंने बुद्ध का एक स्तूप बनवाया. बुलढाणा का मूल नाम बुद्धठाना है. 



यहाँ पाए गए बुद्ध की प्रतिमा के सिर ब्राह्मणों ने फेंक दिया और उस प्रतिमा को सिंदूर फासकर उसे एक देवी के रूप में तब्दील कर दिया.



उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र को पाली भाषा में महारट्टी कहा जाता है. यह नाग लोगों का प्रदेश है. सम्राट अशोक ने पैठन नाम की एक राजधानी बनाई थी. उसका असली नाम पेतनिक है. उसने इस राजधानी में एक स्तूप और भोन स्तूप भी बनवाया था.



लेकिन, जायकवाड़ी बांध में सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया स्तूप नष्ट कर दिया गया. इस परिसर में लाखों स्तूप है एसा चीनी प्रवासी ह्वेनसांग का कहना है. इनमें से चार स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए थे. 



लगभग ढाई हजार साल पहले तथागत बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद सम्राट अशोक ने अफगानिस्तान तक 84 हजार स्तूप बनवाए. साथ ही भिक्खुओं को रहने के लिए कई विहार बनाये थे. ऐसी जानकारी प्रो. विलास खरात ने दी.




विश्वरत्न डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर ने दुनिया का सबसे महान धम्म बौद्ध धम्म हमें दिया. डॉ. अम्बेडकर धनगर और ओबीसी लोगों को सम्राट अशोक और तथागत बुद्ध की विरासत से जोड़ना चाहते थे. अगर, ओबीसी के लोग अंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़े, तो हमारी व्यवस्था खत्म हो जाएगी ऐसा डर ब्राह्मणों में था. 



इसलिए, ब्राह्मणों ने सम्राट अशोक और बुद्ध की विरासत को समाप्त करने का काम किया. सम्राट अशोक द्वार बनाए स्तूप को नितिन गडकरी और देवेंद्र फड़नवीस द्वारा जयकवाड़ी बांध में बुझाने का काम किया. इसके लिए उन्होंने 13 हजार करोड़ रूपये दिए. 



उन्होंने कहा कि भोन स्तूप परिसर क्षेत्र में 30 कुएँ पाए गए. उस समय, किसान तीन फसलों की कटाई करते थे. अनाज की भारी मात्रा में आपूर्ति होती थी. यह विरासत मिटनी नहीं चाहिए इसलिए हमें जान की बाजी लगानी होगी.



सावन महीने का बुद्ध की विरासत से संबंध है. उन दिनों मांसाहार पर पाबंदी थी, जो खायेगा उसे सजा दी जाती थी. लेकिन, इसी महीने को ब्राह्मण द्वारा श्रावण में बदल दिया. 



बाबासाहेब अंबेडकर की बड़ी कृपा है. यहाँ तक कि जब उनके पाँच बच्चे चले गए, तो उन्होंने समुदाय के लिए काम करना बंद नहीं किया. केवल बाबासाहेब का जय जयकार करने से हमारी समस्याओं का समाधाना नहीं होगा. इसलिए उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाया जाना चाहिए.



सरकार, बाबासाहेब के साहित्यों को नहीं छाप रही है. सरकार ने उनके साहित्य पर प्रतिबंध लगा दिया है. 1956 से 1981 तक, कांग्रेस ने बाबासाहेब के साहित्य पर प्रतिबंध लगा दिया. बाबासाहेब की सामग्री पाँच बड़ी संदूकों में बंदिस्त है. उसमें आज दीमक लगा हुआ है. 



बाबासाहब के साहित्यों पर लगी पाबंदी हटनी चाहिए, इसलिए एड.जीबी बंसोड ने एक मुकदमा दायर किया था. उस समय, सविता अंबेडकर ने ‘द संडे ऑब्जर्वर’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि मेरे पास बाबासाहब का मूल साहित्य था. 



1981 में जीबी बंसोड, प्रकाश अंबेडकर और सविता अंबेडकर का सरकार के साथ करार हुआ था कि बाबासाहेब का साहित्य मुद्रित किया जाएगा. लेकिन, यह करार खत्म हुआ. इसी दौरान प्रकाश अंबेडकर ने 



मुंबई उच्च न्यायालय में मामला दायर करने के बाद भी सरकार ने साहित्य छापने से इनकार कर दिया. अगर, बाबासाहेब का साहित्य नहीं छापा गया तो कल बड़ी लड़ाई लड़नी  होगी, ऐसा आवाहन उपस्थित लोगों से की.



दूसरा बौद्ध अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 1954 में म्यांमार में आयोजित किया गया था. बाबासाहब उस सम्मेलन में गए थे. उस सम्मेलन में बाबासाहेब को बुद्ध की प्रतिमा उपहार में दी गयी थी. बाबासाहब ने उपहार में मिली यह प्रतिमा राष्ट्रसंत तुकाराम महाराज के देहु गाँव में स्थापित की. क्योंकि बाबासाहब जानते थे कि तुकाराम महाराज बुद्ध को मानते थे. 



जैसे ही बुद्ध की प्रतिमा देहु गाँव में स्थापित की वैसे ही वाई का ब्राह्मण लक्ष्मण शास्त्री जोशी ने बयान दिया कि अंबेडकर का अवतार समाप्त हो गया हो गया है. प्रो.खरात ने नई जानकारी देते हुए कहा कि पंढरपुर का पांडुरंग यह पुंडलिक यानी तथागत बुद्ध हैं. उन्होंने कहा कि देहु रोड के बौद्ध विहार को स



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