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शहीद ऊधम सिंह की फाँसी के अस्सी बरस

Published On :    18 Sep 2019   By : MN Staff
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क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह (26 दिसंबर, 1899ः 31 जुलाई, 1940) की जिंदगी रूमानियत में डूबी कहानी है. ऊधम सिंह को हमने एक ऐसे नौजवान के रूप में जाना-सुना है, जो एक संकल्प को 21 साल तक अपने सीने में दबाये रखता है. यह संकल्प एक घटना से जुड़ा हुआ है.



 13 अप्रैल, 1919 को पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे और बेकसूर हजारों भारतीयों को मार दिया गया था. 


इस सभा में बीस साल का एक नौजवान भी था, जिसने अपनी आँखों से इस खौफनाक मंजर को देखा था. उसी दिन उस नौजवान ने यह प्रण किया कि जनरल डायर को मारकर वह इस नरसंहार का बदला जरूर लेगा.



21 साल के बाद यह समय आया. 13 मार्च, 1940 की शाम को लंदन के खचाखच भरे कैक्सटन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की गोष्ठी समाप्त होने के बाद पंजाब प्रांत के पूर्व गवर्नर माइकल ओ डायर पर एक भारतीय ने अपनी रिवॉल्वर से तड़ातड़ दो गोलियाँ दाग दी. 


यह भारतीय अपनी जगह पर गिरफ्तार होने के लिए खड़ा रहता है. यह कोई और नहीं, बल्कि वही ऊधम सिंह था, जिसने जलियावाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था. ऊधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, कोर्ट ने दो पेशी के बाद ऊधम सिंह को फाँसी की सजा मुकर्रर कर दी. 



दरअसल, यही उस क्रांतिकारी की चाहत थी. उसने कोर्ट से कोई राहत की गुहार नहीं की. परिणामस्वरूप 31 जुलाई, 1940 को ब्रिटेन में क्रांतिकारी ऊधम सिंह को फाँसी दे दी गयी. देश के बाहर फाँसी की सजा पाने वाले ऊधम सिंह दूसरे क्रांतिकारी थे.


ऊधम सिंह द्वारा जनरल माइकल ओ डायर की इंग्लैंड में हत्या करके, जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने की अनुगूँज भारत भी पहुँची. 17-19 मार्च, 1940 को रामगढ़ में आयोजित एक अधिवेशन में ऊधम सिंह जिंदाबाद के नारे लगे. 



ब्रिटिश साम्राज्य के घर में घुसकर एक पूर्व राजनयिक की हत्या करने के ऊधम सिंह के इस साहस की सराहना की गई. ऊधम सिंह के साहस और बलिदान की इस अमिट कहानी को केवल एक नौजवान के संकल्प और बदला लेने के जुनून के तौर पर ही रेखांकित किया गया है. जबकि, सच्चाई यह है कि ऊधम सिंह, भगत सिंह के साथी थे और उन्हीं की तरह क्रांतिकारी भी थे. 



उनके बलिदान को भी भगत सिंह की तरह ही साम्राज्यवाद से मुक्ति के महत उद्देश्य के तौर पर देखा जाना चाहिए. एक सच यह भी है कि ऊधम सिंह की जिंदगी तमाम क्रांतिकारी साथियों से कहीं अधिक संघर्ष भरी रही है. 26 सितंबर, 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में ऊधम सिंह का जन्म हुआ था. 



बचपन में उनका नाम शेर सिंह था. सात साल की उम्र में माँ-बाप दोनों का साया उठ जाने से वो अनाथ हो गए. तब उन्हें अपने बड़े भाई मुक्ता सिंह के साथ अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी. अनाथालय में उन्हें ऊधम सिंह नाम मिला और बड़े भाई को साधु सिंह. 



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1917 में साधु सिंह की भी मृत्यु हो गयी. निपट अकेले ऊधम सिंह ने हिम्मत नहीं हारी. 1919 के जलियांवाला कांड होने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में दाखिल हुए. साथ ही साथ वे पढ़ाई भी कर रहे थे. पढ़ाई के दौरान ही लाहौर में भगत सिंह से उनकी मुलाक़ात हुई थी. 



सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऊधम सिंह अनुसूचित जाति से आते थे. ऊधम सिंह का बलिदान स्वाधीनता आंदोलन में अनुसूचित समुदाय की भागीदारी को दर्शाता है. यह दीगर बात है कि आजादी के बाद स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की तैयार सूची में कितने अनुसूचित समुदाय के नाम दर्ज हैं?



ऊधम सिंह के बलिदान को नए संदर्भों में समझने की जरूरत है. आजकल राष्ट्रवाद का शोर कुछ ज्यादा ही सुनाई पड़ रहा है. ऐसे में क्रांतिकारी आंदोलन पर बात करना ज़रूरी है. दरअसल, स्वाधीनता आंदोलन में कई छोटी बड़ी धाराएँ थीं जो देश की आजादी के लिए प्रयास कर रहीं थीं. 



1885 में काँग्रेस की स्थापना हो चुकी थी. प्रारंभिक काँग्रेस के वार्षिक अधिवेशन ब्रिटिश हुक़ूमत में प्रशासनिक सुधार और भारतीयों के प्रतिनिधित्व की माँग पर केंद्रित हुआ करते थे. लेकिन, बंगाल से उभरा क्रांतिकारी आंदोलन अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति के संकल्प के साथ आगे बढ़ता दिखाई देता है. 



कांग्रेस की नरम और गरम दलीय राजनीति के बरक्स क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के अत्याचार, अन्याय और अपमान का बदला लेने, उनकी ज्यादतियों पर प्रहार करने की रणनीति अपनाई. मुझे लगता है कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद के सबसे मौजूँ प्रतीक और नारे क्रांतिकारी आंदोलन ने ही सृजित किये. 



वंदे मातरम और इंकलाब जिंदाबाद जैसे नारों के साथ क्रांतिकारी, आत्मबलिदान को ही परम राष्ट्रीय मूल्य निर्मित कर रहे थे. वास्तव में राष्ट्रवाद की एक स्पष्ट विचारधारा, उसके प्रतीक और नैतिक मूल्य पहले-पहल क्रांतिकारी आंदोलन में ही दिखाई पड़ते हैं. इतना ही नहीं, इन नौजवानों के पास भारत के भविष्य और उसकी राजनीति की भी बहुत स्पष्ट समझ दिखाई देती है. 



8 और 9 सितंबर, 1928 को फिरोजशाह कोटला मैदान, दिल्ली में ‘‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’’ की बैठक में ब्रिटिश शासन को खत्म करके भारत को एक समाजवादी देश के रूप में स्थापित करने का सपना क्रांतिकारियों के द्वारा बुन लिया गया था. इसके बरक्स मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ब्रिटिश हुक़ूमत का गाहे-ब-गाहे सहयोग करते हुए धार्मिक राष्ट्रवाद के विचार को उछाल रहे थे. 



‘कौम’ के आधार पर दो अलग-अलग राष्ट्र की बात करने वाले ये दोनों संगठन बुनियादी तौर पर एक ही दृष्टि से सम्पन्न थे. उनका विभाजनकारी राष्ट्रवाद का विचार दरअसल देश को महज भौतिक अधिरचना के तौर पर ही रेखांकित कर रहा था. इनका मानना था कि इस भूखण्ड पर कब्जा करना उनका निजी अधिकार है.



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अंग्रेजी हुक़ूमत के ज़ुल्मों का एक लंबा इतिहास है. जलियांवाला बाग हत्याकांड उसकी एक निर्मम कड़ी है. इस दुर्घटना की पृष्ठभूमि में अंग्रेजों का काला कानून ‘रोलेट एक्ट’ है. इस कानून के तहत अंग्रेज सरकार किसी भी भारतीय को बिना कारण बताये गिरफ्तार कर सकती थी. उसे जितने दिन चाहे, बिना किसी सुनवाई के जेल में रख सकती थी. फलस्वरूप जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए. 



अमृतसर में रोलेट एक्ट का विरोध करने पर डॉ. सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू, दो बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया. इस गिरफ्तारी के विरोध में एक सभा जलियांवाला बाग में आयोजित की गई. अमृतसर का अंग्रेज पुलिस अधिकारी डायर अपने सिपाहियों के साथ वहाँ पहुँचता है. 



बाग के एकमात्र दरवाजे पर तैनात अपने सिपाहियों को डायर सभा में उपस्थित लोगों पर गोली चलाने का आदेश देता है. बिना किसी चेतावनी के करीब दस मिनट तक सिपाही लोगों पर लगातार गोलियाँ बरसाते रहे. गोलियाँ खत्म होने के बाद ही बंदूकें ख़ामोश हुईं. इस हत्याकांड की जाँच के लिए अंग्रेज सरकार द्वारा नियुक्त कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक 279 लोग मारे गए और 1200 लोग घायल हुए. 



जबकि, हकीकत में मरने वालों की संख्या हजारों में थीं. यह घटना इतनी अमानवीय और नृशंस थी कि पूरी दुनिया में ब्रिटिश सरकार की तीव्र आलोचना हुई. अंग्रेज सरकार ने अमृतसर के पुलिस अधिकारी डायर को बर्खास्त करके वापस इंग्लैंड भेज दिया.



इंग्लैंड में बर्खास्त जनरल डायर को कई नागरिक सम्मान दिए गए. यहाँ तक कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी उसे ‘वीरतापूर्ण कृत्य’ के लिए तलवार देकर सम्मानित किया गया. बहुत मौजूँ सवाल यह है कि जिस डायर के कारण ब्रिटिश सरकार की पूरी दुनिया में इतनी तीखी आलोचना हुई थी, उसे नागरिक और संसद द्वारा सम्मानित करने का औचित्य क्या है? दरअसल, इसके पीछे एक ऐसा सच है जिसे न तो ब्रिटिश गजेटियर में जगह दी गई और न ही भारतीय इतिहासकारों ने दर्ज करना उचित समझा. 



एक ऐसा प्रसंग जो सबाल्टर्न इतिहास लेखन का हिस्सा हो सकता है. प्रो. मुशीरुल हसन जैसे सबाल्टर्न इतिहासकारों ने इतिहास लेखन की आधार सामग्री साहित्य को बनाया. जिस प्रकार 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की व्यापकता को समझने के लिए उस समय के लोकगीतों का अध्ययन किया गया है. 



उसी तरह से डायर के ‘सम्मान’ के पीछे की परिस्थिति को भी रेखांकित किया जा सकता है. विभाजन के समय पाकिस्तान गये अब्दुल्ला हसन के उपन्यास ‘उदास नस्लें’ में स्वाधीनता आंदोलन और विभाजन की त्रासदी को रचा गया है. इस उपन्यास में अमृतसर में हुए रोलेट एक्ट के विरोध का घटनाक्रम दर्ज है.



उपन्यासकार लिखता है कि अमृतसर में रोलेट एक्ट का विरोध हिंसक हो गया था. भारतीय नौजवान अंग्रेजों को निशाना बना रहे थे. उन्होंने अंग्रेज औरतों के साथ अभद्रता, हिंसा और बलात्कार किये. उनके बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया. हमें इस बात को दर्ज करना होगा कि आंदोलन और विरोध प्रदर्शन कई बार हिंसक हो जाते हैं. 



हिंसा किसी भी समाज के सभ्य होने का कोई सबूत नहीं है. हिंसा बर्बर रूप लेती है और इसके सबसे ज्यादा शिकार औरतें और बच्चे होते हैं. रोलेट एक्ट के विरोध में नौजवानों की हिंसा जितना भारत के लिए कलंकित करने वाली थी, उतना ही ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भी. 



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यही कारण है कि पंजाब के गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर ने अपने हमनाम सबसे बर्बर पुलिस अधिकारी डायर को अमृतसर में नियुक्त किया. पहुँचते ही उसने अमृतसर के बेकसूर और निरीह लोगों को रेंगकर चलने के लिए मजबूर किया. पूरे शहर में कोई भी उसके जानते हुए सीधे नहीं चल सकता था. 



इस अमानवीयता से भी उसका दिल नहीं भरा तो उसने जलियांवाला बाग में एकत्रित लोगों को बर्बरतापूर्वक गोलियों से छलनी करवा दिया. बदले की इस आक्रामक कार्यवाही के पुरस्कार स्वरूप उसे बर्खास्त होने के बावजूद, इंग्लैंड में कई संगठनों द्वारा कई स्थलों पर सम्मानित किया गया. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम डायर की कार्यवाही को सही कह रहे हैं. बल्कि, सच्चाई यह है कि कुछ नौजवानों की गलती की सज़ा पूरे अमृतसर ने भोगी और हजारों लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी.


अब हम ऊधम सिंह के जीवन की ओर लौट चलते हैं. कहा जाता है कि ऊधम सिंह ने जनरल डायर से बदला लेने की बात मन में ठान ली थी. लेकिन, जिस डायर ने जलियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम दिया था, वह 1927 में ही लकवे और अन्य बीमारियों की वजह से मर गया था. 


तब बदला किससे और कैसे? वास्तव में ऊधम सिंह कोई जुनूनी क्रांतिवीर नहीं थे, बल्कि वे स्वाधीनता की चेतना और देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण व्यक्ति थे. इसका प्रमाण यह है कि ऊधम सिंह 1924 में गदर पार्टी से जुड़े. यह संगठन कनाडा और अमेरिका में बसे भारतीयों द्वारा 1913 में भारत में क्रांति करने के उद्देश्य से बनाया गया था. 



गदर पार्टी से जुड़ने के बाद ऊधम सिंह जिम्बाब्वे, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और ब्राजील की यात्रा पर गये, जहाँ उन्होंने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के लिये चंदा जुटाया और समर्थन माँगा. भगत सिंह के बुलाने पर वे 1927 में भारत लौट आये. वहाँ से वे गोला-बारूद और रिवॉल्वर भी साथ लाये. 



रिवॉल्वर और गदर पार्टी का प्रतिबंधित अखबार ‘गदर की गूँज’ रखने के जुर्म में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनपर मुकदमा चला और पाँच साल की सजा हुई. जेल में उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई. दोनों में दोस्ती ही नहीं गहरी समानता भी थी.



 दोनों पंजाब के रहने वाले थे. एक ही तरह के जुर्म में दोनों को फाँसी की सज़ा हुई थी. दोनों नास्तिक थे और दोनों ने ही फाँसी लगने से पहले धर्मग्रंथ का पाठ करने से इनकार कर दिया था.



स्वाधीनता आंदोलन की क्रांतिका



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