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आरटीआई डालने के बाद भी चुनाव आयोग की तरफ से नहीं दिया कोई जवाब : द क्विंट

Published On :    24 Aug 2019   By : MN Staff
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‘द क्विंट’ ने लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान वीवीपीएटी के डिटेल और कॉपी की मांग करते हुए चुनाव आयोग के पास एक आरटीआई दायर की थी. चुनाव आयोग ने वीवीपीएटी की डिटेल साझा करने से इनकार कर दिया



नई दिल्ली: बार-बार चुनाव आयोग ईवीएम घोटाले पर पर्दा डालने के लिए झूठ पर झूठ बोलते जा रहा है. जबकि, सुप्रीम कोर्ट मान चुका है कि ईवीएम ईमानदार नहीं है. जब तक वीवीपीएटी नहीं लगाया जा सकता है और वीवीपीएटी से निकलने वाली पर्ची की 100 प्रतिशत गिनती नहीं होती है तब तक ईवीएम से निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकता है. इसके बाद भी चुनाव आयोग ईवीएम को ईमानदार बताकर घोटाले पर पर्दा डाल रहा है. 


गौरतलब है कि ‘द क्विंट’ ने लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान वीवीपीएटी के डिटेल और कॉपी की मांग करते हुए चुनाव आयोग के पास एक आरटीआई दायर की थी. अपने जवाब में चुनाव आयोग ने इस आधार पर वीवीपीएटी की डिटेल साझा करने से इनकार कर दिया कि ये चुनाव आयोग मुख्यालय के पास उपलब्ध नहीं है. 


आयोग ने हमें वीवीपीएटी काउंट की जानकारी के लिए सभी राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारियों के पास अलग-अलग आरटीआई दाखिल करने के लिए कहा. 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2019 लोकसभा चुनावों में हर ईवीएम को वीवीपीएटी मशीन से जोड़ा गया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि वोटर को ये पता चल सके कि उसने जिस उम्मीदवार को वोट दिया है. 


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दरअसल, वोट उसी को दर्ज हुआ है. वीवीपीएटी और ईवीएम के मिलान को लेकर लोकसभा चुनाव 2019 के समय भी खूब हंगामा मचा था. काउंटिंग खत्म होने के बाद चुनाव आयोग ने ऐलान किया था कि पूरे देश में ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आया. जिसमें ईवीएम और वीवीपीएटी की गिनती में अंतर दिखा हो.


लोकसभा चुनाव 2019 का मतदान केंद्रवार आंकड़ा आयोग के पास उपलब्ध नहीं है. ये सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सीईओ के पास उपलब्ध हो सकता है. आप अलग से आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन जमा करके राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सीईओ के ऑफिस से जानकारी ले सकते हैं. आपका एप्लीकेशन उन्हें ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है. क्योंकि, एक से ज्यादा पीआईओ आरटीआई अधिनियम, 2005 के यू/एस 6 (3) में शामिल हैं.


द क्विंट ने कहा हमें यकीन नहीं हुआ कि लोकसभा चुनाव कराने की जिम्मेदारी जिसकी है? उसके पास लोकसभा चुनाव से जुड़ी इतनी जरूरी जानकारी नहीं है सो हमने चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट को खंगाला. वेबसाइट पर हमें इस बात के दो संकेत मिले, जिससे लगता है कि चुनाव आयोग हमें गुमराह कर रहा है. 


द क्विंट ने कहा दरअसल चुनाव आयोग की वेबसाइट पर हमें एक सर्कुलर मिला जो उसने राज्यों के चीफ इलेक्शन ऑफिसरों को भेजा था. इसमें आयोग ने कहा था कि काउंटिंग खत्म होने के 7 दिन के अंदर सीइओ वीवीपीएटी काउंट का डेटा चुनाव आयोग को दें. चुनाव आयोग ने ये सर्कुलर 15 अप्रैल, 2019 को जारी किया था. 


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वोटों की गिनती से ठीक दो दिन पहले 21 मई, 2019 को चुनाव आयोग ने एक और सर्कुलर जारी किया था. जिसमें, सभी राज्यों और यूटीएस के चीफ इलेक्शन ऑफिसर को कहा गया था कि वे चुनाव आयोग को वीवीपीएटी स्लिप वेरिफिकेशन पर सिर्फ विस्तार से रिपोर्ट ही जमा न करें, बल्कि वीवीपीएटी स्लिप का काउंट भी बताएं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सर्कुलर जारी होने के बाद भी राज्यों से चुनाव आयोग को डेटा नहीं मिला या फिर आखिर चुनाव आयोग के पास डेटा है और वो शेयर नहीं करना चाहता? ईवीएम के वोटों की गिनती पहले ही सार्वजनिक हो चुकी है ऐसे में क्या ईवीएम और वीवीपीएटी के वोटों की गिनती में कोई अंतर है? और क्या इसे चुनाव आयोग छिपाना चाहता है? उसने उस समय यह कहा था कि चुनाव आयोग लोगों को गुमराह कर रहा है. 


हालांकि, बाद में चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा कि हमें वीवीपीएटी काउंट के लिए सभी राज्यों के चीफ इलेक्शन ऑफिसर्स को अलग से आरटीआई दाखिल करनी चाहिए. जबकि, चीफ इंफॉर्मेशन कमीशन ने 16 जून 2011 को अपने आदेश में कहा था कि ये जिस पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर से जानकारी मांगी जा रही है. 


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अगर उसे 50 या 100 पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर से भी जानकारी लेकर देनी पड़े, तो दे. द क्विंट चुनाव आयोग के जवाब पर एक याचिका पहले ही दाखिल कर चुका था और अब उसे सेंट्रल इनफॉर्मेशन कमीशन तक ले जाने की बात कही थी. 


उनका यह भी मानना था कि अगर जरूरत पड़ी तो, हम पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराएंगे और गुमराह करने वाली जानकारी देने के लिए उन्हें सजा देने की मांग करेंगे. 

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