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पुरातत्व विभाग के रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए आस्था के आधार पर दिया अयोध्या का फैसला

Published On :    6 Oct 2022   By : MN Staff
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डॉ. विलास खरात का गंभीर आरोप



नागपुर: सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालिन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा अयोध्या विवाद पर जो फैसला दिया गया उस पर कई लोग सवाल खड़ा कर चुके है. अब इस फैसले पर बुद्धिष्ठ इंटरनैशनल नेटवर्क के राष्ट्रीय प्रभारी डॉ. विलास खरात ने भी सवाल खड़े कर दिए है. उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए आस्था के आधार पर अयोध्या का फैसला दिया है. बुधवार को नागपुर में आयोजित बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क के 5 वे राष्ट्रीय अधिवेशन में बोल रहे थे.


डॉ. विलास खरात ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट के द्वारा मुनिअप्पम स्वामी मंदिर का विवाद हल किया गया. ब्राह्मण जिस मुनिअप्पम स्वामी को अपना देवता मानते थे तो वहां के बुद्धिस्ट समाज के एक्सपर्ट लोगों ने आर्कोलॉजी का सहारा लिया और मद्रास हाईकोर्ट को डिमांड किया कि मुनिअप्पम स्वामी यह किसी भी आधार पर ब्राह्मणों के देवता नहीं लग रहे है बल्कि पुरातत्व के आधार पर वो बुद्धा ही है. जज साहब ईमानदार थे और हर एक जज को ईमानदार भी रहना चाहिए. वो बात अलग है कि जस्टिस गोगोई ईमानदार नहीं रहें.


उन्होंने कहा कि जज को अपने पेशे के साथ ईमानदार होना चाहिए. मद्रास हाईकोर्ट के जज साहब ईमानदार निकले मगर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ईमानदार नहीं निकले. धोका किया उन्होंने. मुनिअप्पम स्वामी कौन है इसका आधार मद्रास हाईकोर्ट ने इसको लेकर पुरातत्व को आधार बनाया और ब्राह्मणों के ही हाथों से, जो हर दिन लेप लगाते थे, जिसके अंदर मूल मूर्ति ढ़की थी, उनके ही हाथों से लेप को खरोंचा गया और पूरातत्व के लोगों ने रिपोर्ट बनाकर मद्रास हाईकोर्ट में दाखिल किया. इस आधार पर मद्रास हाईकोर्ट के जज साहब ने फैसला देते हुए कहा कि हम लोगों ने पुरातत्व के लोगों को रिपोर्ट मांगा उसके आधार पर यह फैसला देते है कि मुनिअप्पम स्वामी को आईंदा मुनिअप्पम स्वामी नहीं कहा जाए बल्कि वो तथागत भगवान बुद्ध है. ऐसा आज हम जजमेंट देते है.


डॉ. विलास खरात ने कहा कि हम लोग मुनिअप्पम स्वामी को लेकर मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर चर्चा का मुद्दा इसलिए खड़ा कर रहे है क्योंकि इसके आधार पर अयोध्या में जो विवाद हुआ और पांच जसेस के द्वारा जो फैसला दिया गया, वो फैसला कानून के मुताबिक नहीं है. बल्कि वो फैसला पुरातत्व के आधार पर नहीं बल्कि आस्था के आधार पर है. 


बी.आर मनी जो आर्कालॉजिस्ट था, जो अभी भी जिंदा है, और दूरसे आर्केलॉजिस्ट मांझी इनके नेतृत्व में अयोध्या में जो विवादित जगह थी 1.75 एकड़ उसका 2002 में उत्खनन हुआ, उसकी दो खंडों में रिपोर्ट मौजूद है, आर्केलॉजि के रिपोर्ट को आधार बनाकर 2010 में ईलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया और भारतीय पुरातत्व विभाग के रिपोर्ट के दरकिनार करते हुए आस्था के आधार पर यह फैसला दिया. और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस गोगोई ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को जारी रखते हुए फैसला दिया.


बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क के राष्ट्रीय प्रभारी ने कहा कि साल 1865 में सर मेजर जनरल कनिंघम के द्वारा अयोध्या में जो उत्खनन हुआ, उसके आधार पर यह प्रमाणित हुआ है कि अयोध्या यह अयोध्या नहीं बल्कि साकेत है. जहां पर भगवान बुद्ध 6 साल रूके थे और वहीं धम्म की पवित्र जगह मानकर सम्राट अशोक ने वहां पर बड़े-बड़े स्तूप और विहार बनवाएं. और विशाखा के द्वारा भगवान बुद्ध को एक विशाल संगाराम यानी विहार भेट किया था. 


उसका नाम है पुब्बाराम विहार. हम नागपुर में मद्रास हाईकोर्ट के जजमेंट को इसलिए चर्चा में ले रहे है क्योंकि जस्टिस गोगोई को ब्लैकमेल किया गया. एक महिला के माध्यम से जस्टिस गोगोई पर चरित्र को लेकर उंगलियां उठाई गई. अभी दस दिन पहले खबर आई कि गोगोई की क्या जांच हुई, जांच में क्या पाया गया, वो डेटा सार्वजनिक किया जाए.


डॉ.विलास खरात ने आरोप लगाया कि गोगोई मैनेज हो गए है. गोगोई को आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के द्वारा मैनेज किया गया. जस्टिस बोबड़े, जस्टिस गोगई और जो पांच जसेस वहां मौजूद थे, वो रामायण और महाभारत का समय तक नहीं बता पाए, वो जज कैसे हुए? जहां यह वेरीफाई हो रहा था, उन्होंने पक्षकारों और साक्षीदारों को मैनेज किया गया. 


उसके एक बुद्धिष्ठ पार्टी थी, उसको सुनवाई की तारीख दिया, लेकिन उस दिन लोग अगर हंगामा कर दें तो यह बात भारत और भारत के बाहर जाएगी. यह ना हो इसलिए सुब्रमण्यम स्वामी को आरएसएस के लोगों ने योजना बनाकर कोर्ट में बिठाया. और जो केस ड़ालने वाला अनु.जाति, अनु.जनजाति का व्यक्ति नहीं था. वह मौर्य नाम का ओबीसी का व्यक्ति था. जो मूलतः बुद्धिष्ठ है.


उन्होंने आरोप लगाया कि अयोध्या का फैसला मैसेज करके दिया गया. यह फैसले का दायरा था 1.75 एकड़. मगर उसके चारों तरफ से अलग- अलग जो स्तूप है वो आज भी मौजूद है. यह वहीं स्तूप है, जिसका वर्णन फैयान और हुएनसांग ने चौथी और सातवीं शताब्दी में वहां आकर देखा और इसका जिक्र किया. 


ब्राह्मण आज इसका प्रचार हनुमान गढ़ी बताकर करते है. सर मेजर जनरल कनिंगहम कहते है यह हनुमान गढ़ी नहीं बल्कि सम्राट अशोक के द्वारा जो वॉल बनाया गया था उसका एक पिलर है. ब्राह्मण लोगों ने उसको मंदिर में तब्दील कर दिया. उसे ही आज ब्राह्मण हनुमान गढ़ी कह रहे है. आज ब्राह्मण स्तूप को कुबेर पर्वत कह रहे है. इसके बुद्धा के शरीर के अवशेष है.

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