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पूर्व जज बोली- रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की रिपोर्ट होनी चाहिए थी सार्वजनिक

Published On :    30 Sep 2022   By : MN Staff
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पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक किया जाना चाहिए था क्योंकि इससे इस मुद्दे से जुड़े संदेह दूर हो जाते.



नई दिल्ली : पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक किया जाना चाहिए था क्योंकि इससे इस मुद्दे से जुड़े संदेह दूर हो जाते. बार एंड बेंच को दिए एक साक्षात्कार में 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने यह बात कहीं. पूर्व जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट की एक कर्मचारी द्वारा तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के बारे में विस्तार से बात की.


जस्टिस बनर्जी ने दावा किया कि गोगोई ‘मुसीबत में इसलिए पड़े’ क्योंकि वह ‘स्टाफ के साथ कड़ाई के साथ पेश आते’ थे. ‘काश रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाता. इससे उनसे और हमसे जुड़े संदेह साफ हो जाते. गौरतलब है कि 2019 के अप्रैल में इस महिला कर्मचारी ने शीर्ष अदालत के 22 जजों को भेजे हलफनामे में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. अदालत में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट पद पर कार्यरत महिला का कहना था कि चीफ जस्टिस द्वारा उनके साथ किए ‘आपत्तिजनक व्यवहार’ का विरोध करने के बाद उन्हें, उनके पति और परिवार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा.


महिला पर दिल्ली पुलिस ने धोखाधड़ी का एक मामला दर्ज किया था, जिसमें एक व्यक्ति ने उन पर आरोप लगाया था कि इस महिला ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नौकरी दिलाने के एवज में 50 हज़ार रुपये की रिश्वत ली थी, लेकिन नौकरी नहीं मिली. महिला का कहना था कि यह मामला झूठा है. वे इस व्यक्ति को जानती भी नहीं हैं. महिला का दावा था कि सीजेआई के खिलाफ शिकायत करने पर उन्हें परेशान किया जा रहा है.


इन आरोपों को लेकर उस समय एक जांच समिति गठित हुई थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जजों के साथ ही जस्टिस इंदिरा बनर्जी शामिल थी. मामले की सुनवाई शुरू होने के कुछ दिन बाद पीड़ित ने आंतरिक समिति के माहौल को डरावना बताते हुए समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया था. इसके बाद जांच समिति द्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को क्लीनचिट दे दी गई थी. समिति ने कहा था कि महिला द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं है. इस फैसले पर शिकायतकर्ता ने कहा था कि उनके साथ घोर अन्याय हुआ है और सर्वोच्च अदालत से न्याय की उनकी उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो गई हैं.


जस्टिस बनर्जी ने कहा कि जांच समिति यह तय करने के लिए नहीं बैठी थी कि ‘उत्पीड़न हुआ है या नहीं’ बल्कि उसे यह देखना था कि क्या गोगोई ने ऐसा कोई काम किया है जिससे उन्हें पद से हटाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि जांच को कभी भी खारिज नहीं किया गया लेकिन कर्मचारी ने गोगोई के खिलाफ लगाए गए ‘आरोप सिद्ध नहीं’ हुए. उन्होंने जांच रिपोर्ट लिखी थी और जांच समिति के अध्यक्ष जस्टिस एसए बोबडे ने उन्हें व्याकरण और वर्तनी की चूकों को लेकर ज्यादा परेशान न होने की बात कहते हुए कहा था कि रिपोर्ट कभी प्रकाशित नहीं होगी.


बनर्जी के अनुसार, तब उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि वे यही मानकर लिखेंगी कि इसे प्रकाशित होना है. बनर्जी ने कहा था, ‘आज नहीं तो कल किसी को यह कहने का मौका नहीं मिलना चाहिए कि इसे यूं ही रफा-दफा कर दिया गया क्योंकि वे चीफ जस्टिस थे.’ जस्टिस बनर्जी ने यह भी स्वीकार किया कि आरोपों वाली रिपोर्ट मीडिया में प्रकाशित होने वाले दिन ही सीजेआई गोगोई की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई से बचा जा सकता था. गोगोई द्वारा उनके ही खिलाफ लगे आरोपों को सुनने वाली पीठ की खासी आलोचना हुई थी. सुनवाई में उन्होंने दावा किया था कि ‘इन आरोपों के पीछे सीजेआई कार्यालय को निष्क्रिय बनाने की साज़िश है.


जस्टिस बनर्जी ने कहा, सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता में हुई सुनवाई से बचना चाहिए था. यह बिल्कुल ठीक नहीं था. यदि अन्य न्यायाधीशों के साथ थोड़ा और परामर्श किया गया होता तो प्रेस को जवाब देने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं थी. जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने गोगोई के खिलाफ मामले को देखा था, उसकी नागरिक समाज और जानकारों ने कड़ी आलोचना की थी. जांच समिति ने गोगोई को क्लीन चिट दे दी थी और पूर्व सीजेआई के सेवानिवृत्त के दो महीने बाद महिला को उनके पद पर बहाल कर दिया गया था.


उनकी बहाली के बाद अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा था, ‘सुप्रीम कोर्ट की कर्मचारी सही साबित हुईं. पूरे वेतन के साथ उनकी बहाली होना उनके हलफनामे की सच्चाई, यौन उत्पीड़न की शिकायत और उनके द्वारा भोगे गए दुखों की स्वीकृति है.

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