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यशकायी डि.के.खापर्डे साहब के साथ गद्दारी करने वाले एन.बी.कुरणे ने फिर से संगठन में किया आर्थिक भ्रष्टाचार व गद्दारी!

Published On :    14 Aug 2022   By : MN Staff
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कुरणे ने खापर्डे साहब से केवल गद्दारी ही नहीं कि बल्कि खापर्डे साहब और उनके साथ के कार्यकर्ताओं को गाली-गलौच करने का भी काम उस वक्त किया था. दोनों ने मिलकर खापर्डे साहब, संगठन व समाज को धोखा दिया था.



बामसेफ संगठन में तोड़फोड़ करने वाले जैसे देश के अलग-अलग हिस्सों में से कुछ भ्रष्ट लोग लालन (वी.एल.मातंग) और कमलाकांत काले का समर्थन कर रहे है. वैसे ही महाराष्ट्र के कोंकण विभाग के भी कुछ नाम इसमें शामिल है. उन नामों में प्रमुखता से एन.बी.कुरणे, सुरेश पाटील और संतोष घरत है. आज हम एन.बी.कुरणे के आर्थिक घोटाले व संगठन विरोधी कामों का खुलासा करेंगे.


एन.बी.कुरणे का संगठन विरोधी इतिहास काफी पुराना है. 1995 में बामसेफ संगठन में हुई तोड़फोड़ में एन.बी.कुरणे भी शामिल था. वह उस वक्त बामसेफ के संस्थापक सदस्य यशकायी डि.के.खापर्डे साहब को धोखा देकर एस.एफ.गंगावणे के साथ चला गया था. 2004-05 के बाद जब बामसेफ संगठन का कारवां बामसेफ के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम के नेतृत्व में ब़ढ़ा तब कुरणे फिर से बामसेफ संगठन में कार्यरत हो गया. यशकायी डि.के.खापर्डे साहब को धोखा देने में कुरणे अकेला नहीं था, बल्कि आज जिसने फिर एक बार बामसेफ संगठन को तोड़ने का प्रयास किया है उसमें सुरेश पाटील भी कुरणे के साथ था.


कुरणे ने खापर्डे साहब से केवल गद्दारी ही नहीं कि बल्कि खापर्डे साहब और उनके साथ के कार्यकर्ताओं को गाली-गलौच करने का भी काम उस वक्त किया था. दोनों ने मिलकर खापर्डे साहब, संगठन व समाज को धोखा दिया था. उनकी धोखा देने की फितरत आज भी नहीं बदली है. बामसेफ संगठन को तोड़ने का प्रयास करने वाले गंगावणे के साथ लगभग 9-10 साल काम करने के बाद कुरणे व सुरेश पाटील ने पुनः बामसेफ में काम करना शुरु कर दिया था. इसमें वामन मेश्राम ने उन पर किसी प्रकार का कोई अविश्वास नहीं दिखाया, बल्कि बड़े विश्वास के साथ उन पर राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी सौंपी. एन.बी.कुरणे को राष्ट्रीय मूलनिवासी बहुजन कर्मचारी संघ का राष्ट्रीय महासचिव, तो सुरेश पाटील को भारत मुक्ति मोर्चा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया.


खापर्डे साहब के समय में कुरणे न केवल संगठन विरोधी कार्रवाइयों में लिप्त था, बल्कि आर्थिक भ्रष्टाचार के मामलों में भी शामिल था. खुद खापर्डे साहब ने कुरणे पर कोंकण विभाग के 50 हजार रुपये के आर्थिक भ्रष्टाचार का लिखित आरोप लगाया था और महाराष्ट्र के तत्कालीन बामसेफ प्रदेशाध्यक्ष काम्बले को लिखित आदेश भी किया था कि कुरणे पर कार्रवाई की जाए. आज भी कुरणे की पैसा खाने कि आदत बनी हुई है. कुरणे पर कई ऐसे आरोप कोंकण विभाग के ही कार्यकर्ताओं ने आज भी किए है कि उसने आरएमबीकेएस के राष्ट्रीय महासचिव पद का गैर-इस्तेमाल करके लाखों रुपया अलग-अलग कंपनियों से लिया है.


उरण की एक कम्पनी में आरएमबीकेएस की शाखा थी और काफी मजबूती के साथ आरएमबीकेएस के कार्यकर्ता वहां पर कार्यरत थे. उस कम्पनी को पनवेल में शिफ्ट करने का फैसला मालिक ने लिया था और कामगार उसके विरोध में थे. कम्पनी में कार्यरत आरएमबीकेएस के कार्यकर्ता, सदस्य एवं अन्य कामगारों से किसी प्रकार की कोई चर्चा न करते हुए कुरणे ने कम्पनी के मालिक को यूनियन के पदाधिकारी के रुप में कंपनी को शिफ्टिंग की मंजूरी दी और इसके बदले में कम्पनी से लगभग पांच लाख रुपये लिए और उन्हीं पैसों से कुरणे ने अपने लिए फोर व्हीलर गाड़ी भी खरीद ली. ऐसी जानकारी हमें उसी कंपनी के आरएमबीकेएस के कार्यकर्ताओं ने दी.


इसी तरह कोंडिबा सूर्यवंशी नाम के कार्यकर्ता ने साल 2018-19 में ही संगठन को कुरणे के गैर जिम्मेदाराना एवं भ्रष्ट चरित्र के बारे में लिखित जानकारी भी दी थी. उसी के चलते कुरणे की जांच भी हो रही थी और संगठन के सामने कुरणे द्वारा किया जा रहा आर्थिक भ्रष्टाचार भी सामने आने लगा था. कोंडीबा सूर्यवंशी के मुताबिक कुरणे व सुरेश पाटिल ने आरएमबीकेएस का विस्तार करने के लिए काम नहीं किया. इतना ही नहीं बल्कि संगठन के राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा दिए जा रहे आदेशों-निर्देशों का पालन भी नहीं किया. इसलिए सुर्यवंशी ने कुरणे, सुरेश पाटील और संतोष घरत पर संगठनात्मक कार्रवाई की मांग की थी. कोंडीबा सुर्यवंशी ने केवल इतना ही नहीं कहा बल्कि ये जानकारी भी दी है कि नवकार कार्पोरेशन लिमिटेड में कुरणे कामगारों से चर्चा किए और उनकी मांगों को समझे बगैर ही कम्पनी के साथ चर्चा और डील करते थे. जिसकी वजह से कई बार कामगारों का नुकसान हुआ है.


आरएमबीकेएस ट्रेड युनियन कम्पनी चलाने वालों के फायदे के लिए नहीं बल्कि कामगारों के हितों की रक्षा करने के लिए, उन्हें उनके अधिकार दिलाने के लिए बनाया गया संगठन है. फिर भी कुरणे कम्पनी व खुद के फायदे का विचार करके ही संगठन का काम कर रहा था. दुसरी तरफ कोंडीबा सूर्यवंशी इतने विपरीत परिस्थिति में आरएमबीकेएस का काम कर रहे थे कि कई बार कंपनी ने उन्हें मारने की धमकियां भी दी थी. यहां तक की उन पर कम्पनी ने गुंडों द्वारा हमला भी करवाया था. इसके अलावा कम्पनी ने उन्हें मुंह मांगे पैसे का भी ऑफर दिया था. लेकिन न किसी से डरकर और न ही किसी के लालच में आकर वह संगठन के विचार, सिद्धांत एवं उद्देश्य से एक इंच भी हटे नहीं. अपने जान की परवाह किए बगैर ही आरएमबीकेएस का कारवां आगे बढ़ाते रहे.


कोंडीबा सूर्यवंशी लिखते है कि आरएमबीकेएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कुरणे व सुरेश पाटील की जिम्मेदारी नवकार कम्पनी में संगठन को और मजबूत करने के लिए लगाई थी. नवकार कार्पोरेशन लिमिटेड कम्पनी में 500 कामगार आरएमबीकेएस के सदस्य थे. कुरणे व सुरेश पाटील ने नवकार कंपनी के गेट पर पैर तक नहीं रखा. दुसरी ओर कामगारों की समस्याएं बढ़ने लगी थी और कुरणे तथा पाटील की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई, इससे नाराज होकर कई कामगार संगठन के विरोध में जाने लगे, कईयों ने दुसरी युनियन का रास्ता खोजा और वहां पर अन्य संगठनों की युनियन्स काम करने लगी. जब की सारे कामगार आरएमबीकेएस के सदस्य थे. यानी इन लोगों ने संगठन का काफी नुकसान किया था.


कोंडीबा सूर्यवंशी जैसे जुझारू, कर्मठ एवं उद्देश्य के प्रति अतिगंभीर कार्यकर्ता का मनोबल उठाने के बजाए कुरणे, पाटील व संतोष घरत ने उनका मनोबल सदैव गिराने का काम किया. युनियन बनाने के उनके अनुभव का ज्यादा से ज्यादा कंपनियों में संगठन का विस्तार करने के लिए उपयोग करना चाहिए था, मगर सूर्यवंशी जैसे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने का काम कुरणे व सुरेश पाटिल करते रहे. जब संगठन के पास कुरणे की बहुत सारी शिकायतें आने लगी, तब राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम के द्वारा सुरेश पाटील को उस पर निगरानी रखने के लिए रखा गया था. सुरेश पाटील का काम था की कुरणे के बारे में राष्ट्रीय नेतृत्व को जानकारी देते रहना. ये करने के बजाये सुरेश पाटील खुद कुरणे व मावजी राठोड़ के काला-बाज़ारी में शामिल हो गया. सुरेश पाटील को अपने साथ शामिल कराने के लिए मावजी राठोड़ संगठन के पैसों से सुरेश पाटील को गोवा में पिकनिक करवाने लगा और इस तरह से सुरेश पाटील भी कुरणे व मावजी राठोड़ के काले धंदों का हिस्सेदार बन गया.


आरएमबीकेएस यह बामसेफ का ऑफशूट संगठन है. उसे बामसेफ के दिशा-निर्देश में रहकर अपना कार्य करना था, मगर कुरणे व मावजी राठोड़ बामसेफ को किनारे करते हुए अपने मन से ही काम कर रहे थे. बामसेफ के दिशा-निर्देश को इसलिए बायपास किया ताकि उनका आर्थिक गैर-व्यवहार संगठन के सामने न आ पाए. लेकिन जब संगठन को उनके आर्थिक गैरव्यवहार की बू आने लगी, तब उन पर नियंत्रण एवं निगरानी के लिए आरएमबीकेएस के महाराष्ट्र में राज्य प्रभारी के नियुक्ति कि चर्चा शुरु हुई. मावजी राठोड़ व कुरणे ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि इसकी कोई जरुरत नहीं है. लेकिन फिर भी संगठन ने महाराष्ट्र बामसेफ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी अभिजीत भगत को आरएमबीकेएस का प्रभारी बना दिया.


राज्य प्रभारी बनाने के बाद उनकी अस्वस्थता बढ़ने लगी और वह और तेजी से संगठन विरोधी काम करने लगे. अकोला जिले के राजेंद्र इंगोले नाम के एक कार्यकर्ता को संगठन ने आरएमबीकेएस के राज्य अध्यक्ष कि जिम्मेदारी दी थी. पर संगठन विरोधी गतिविधियों के चलते संगठन ने उसे हटाकर राजेंद्र राजदिप को राज्य की जिम्मेदारी दी. कुरणे ने गुटबाजी करके यह प्रचार शुरू किया कि राजेंद्र इंगोले को पद से हटाना संगठन के बायलॉज के खिलाफ है. इसमें समझने वाली बात ये है कि आरएमबीकेएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम है और राष्ट्रीय अध्यक्ष को संगठन के हितों के ध्यान में रखकर फैसले करने का अधिकार है. उन्होंने उन्हीं अधिकारों का उपयोग किया. कुरणे जो आरएमबीकेएस के राष्ट्रीय महासचिव है उसने यह बात राष्ट्रीय अध्यक्ष को बताने के बजाए कार्यकर्ताओं में चर्चा करना शुरू कर दिया.


इसके बाद राजेंद्र इंगोले को फिर से राज्य अध्यक्ष बनाने के लिए एक बैठक बुलाई. उसके लिए उन्होंने संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष से अनुमति लेनी चाहिए थी या उन्हें जानकारी देनी चाहिए थी, मगर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया. इतना नहीं तो संगठन के द्वारा बनाये गए राज्य अध्यक्ष को हटाकर राजेंद्र इंगोले को फिर से राज्य अध्यक्ष बनाने के बाद भी राष्ट्रीय अध्यक्ष को जानकारी नहीं दी. इससे कुरणे पर सवाल खड़े होते है कि क्या इस तरह से संगठन के शीर्ष नेतृत्व को बिना बताए छुपकर फैसले लेना और उसे लागू करना संगठन के बायलॉज के तहत है? क्या इसे संगठन विरोधी कार्रवाई नहीं कही जायेगी? इसकी जांच करने के लिए संगठन ने तीन सदस्यीय कमेटी बनाई. कमेटी के सामने आया कि कुरणे ने पहले से ही गुट बनाकर, संगठन के केंद्रीय निर्णयों को दरकिनार कर अपने निर्णय लिये थे. जांच कमेटी के सामने ये भी आया की कुरणे का व्यवहार संगठन, समाज एवं नेतृत्व विरोधी है.


एन.बी.कुरणे ने जेएनपीटी से इसी साल स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है. समझ में नहीं आता कि जेएनपीटी की इतनी अच्छी और मोटे तनख़ा वाली नौकरी कुरणे ने छोड़ी क्यों? इसका जवाब ये है कि कुरणे आरएमबीकेएस के अपने पद का गैर इस्तेमाल करके नौकरी से ज्यादा पैसा कमा रहा था. कोंकण के ही कार्यकर्ताओं ने हमें ये जानकारी दी कि, संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं ने शुरू किए हुए कंपनी में निवृत्त होने से पहले ही 10-12 लाख रुपयों का निवेश कुरणे ने किया था. यह निवेश अगर रिटायरमेंट के बाद किया होता तो माना जा सकता था कि कुरणे ने रिटायरमेंट का पैसा निवेश किया है. मगर ऐसा तो दिखाई नहीं दे रहा था. सेवानिवृत्ति से पहले कुरणे के पास इतना सारा पैसा आया कहा से? जो उसने एकाएक किसी कंपनी में इन्वेस्ट कर दिया. इसका भी जवाब यही है कि कुरणे ने कई सारी कम्पनियों के साथ कामगारों की मांगों और उनके हितों को दरकिनार करते हुए सौदेबाजी की और उससे लाखों रुपया कमाया, वरना केंद्र सरकार की नौकरी कौन छोड़ता है भला!


बामसेफ संगठन अपनी विचारधारा पर अड़ीग है. यह तो अब वैज्ञानिक दृष्टीकोन के आधार पर सिद्ध हो गया है कि ब्राह्मण विदेशी है और ब्राह्मणों ने ही भारत के मूलनिवासियों को गुलाम बनाने के लिए पहले वर्ण व बाद में जाति व्यवस्था का निर्माण किया. बहुजनों को टुकड़ों में बांटने के लिए उन्होंने यह व्यवस्था बनाई. मूलनिवासी बहुजनों को बांटने में भले ही ब्राह्मणों का फायदा है, मगर बंटे रहने में मूलनिवासी बहुजनों का क्या फायदा है? बामसेफ इस पर काम कर रहा है और सभी मूलनिवासी बहुजनों को जोड़ने के लिए प्रयासरत है. एन.बी.कुरणे शायद कभी इस विचारधारा को समझ ही नहीं पाया. उसके अंदर की जातीय चेतना अब भी वैसे ही है, जैसे कि बामसेफ में आने से पहले थी. कुरणे जाति से चमार है और संगठन में भी उसने जातियों के आधार पर ही काम करना चाहा. संगठन में काम करने वाले चर्मकार जाति के लोगों का अलग से गुट बनाकर वह काम करता था और संगठन में चर्मकार जाति के कार्यकर्ता को ही बड़े पद मिले इसके लिए कार्यरत रहता था.


बामसेफ में आने के बाद भी कुरणे डि-कास्ट नहीं हो सका. कुरणे ने जातिय चेतना को आधार बनाकर रत्नागिरी जिले के जलगांवकर, अलीबाग के पालकर, मुम्बई के गोरेगांवकर, जालना के रामेश्वर इन जैसे चर्मकार जाति के लोगों में सम्भ्रम निर्माण कर उन्हें तोड़ने का प्रयास किया. बामसेफ संगठन में तोड़फोड़ का प्रयास करने में जाति का भी एक फैक्टर काम कर रहा था. फिर चाहे वह उत्तर प्रदेश में पासी जाति का हो, कमलाकांत काले का ओबीसी का नाम हो या कुरणे हो. कुरणे ने संगठन में कार्यरत चर्मकार जाति के लोगों को जाति के नाम पर संगठन से अलग करने का प्रयास किया था, मगर वह उसमें सफल नहीं हुआ.


संकेत कांबले
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