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आर्थिक विशेषज्ञों की सलाह दरकिनार कर उद्योगपतियों दी गई बैंक खोलने की इजाज़त

Published On :    24 Nov 2020   By : MN Staff
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पूर्व आरबीआई गवर्नर ने बताया ख़तरनाक



नई दिल्ली : रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कई आर्थिक विशेषज्ञों की सलाह को दरकिनार कर बड़े उद्योगपतियों को बैंक खोलने का लाइसेंस देने का फैसला किया हैं. सोमवार को आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने इसे खतरनाक बताते हुए आरबीआई के इस कदम की आलोचना की है. दरअसल बिजनेस से जुड़े घरानों को बैंकिंग सेक्टर में एंट्री के लिए जिस प्रोपोजेल को आरबीआई की इंटरनल वर्किंग ग्रुप (आईडब्ल्यूजी) ने मंजुरी दी है. उसमें कई आर्थिक विशेषज्ञों की सलाह को दरकिनार कर दिया गया.


रघुराम राजन के लिंक्डइन साइट पर आरबीआई के इस कदम को लेकर कहा गया है कि यह सभी विशेषज्ञ आईडब्ल्यूजी से जुड़े थे. सिर्फ एक को छोड़कर सभी की सलाह थी कि बड़े कॉरपोरेट या उद्योगपतियों को बैंक खोलने की इजाजत नहीं देनी चाहिए. इन विशेषज्ञो में से 2 लोगों को मानना था कि उद्योगपतियों के इस सेक्टर में आने के बाद कर्ज बढ़ेंगे और उनके मुताबिक यह हमेशा खतरनाक साबित होगा. इतना ही नहीं इन विशेषज्ञों का यह भी कहना था कि इसके कुछ खास कारोबारी घरानों के हाथ में और ज्यादा आर्थिक और राजनीतिक ताकत आएगी.


आईडब्ल्यूजी ने पिछले सप्ताह अपनी रिपोर्ट जारी कर यह माना था कि सिर्फ एक विशेषज्ञ को छोड़कर अन्य सभी एक्सपर्ट्स की राय थी कि कॉरपोरेट हाउस को बैंकिंग सेक्टर में आने की अनुमति नहीं देनी चाहिए.आईडब्ल्यूजी का नेतृत्व कर रहे पी के मोहंती ने विशेषज्ञों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों का जिक्र प्रोपोजल में किया है. इसमें कहा गया है कि कॉरपोरेट हाउस अपने बिजनेस को अनुचित क्रेडिट दे सकते हैं या फिर उधार देने के मामलों में अपने नजदीकी बिजनेस सहयोगियों का पक्ष ले सकते हैं.


विशेषज्ञों ने जो सलाह आरबीआई को दी थी उसमें यह भी कहा गया है कि यह कॉरपोरेट हाउस तेजी से अपना कारोबार बढ़ा रही हैं और अधिक से अधिक उधारी लेकर परिसंपत्तियां खरीद सकती हैं. ऐसा करने से बैंकिंग प्रणाली के लिए जोखिम खड़ा हो सकता हैं. 


रघुराम राजन औऱ विरल आचार्य ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि ‘जब औद्योगिक घरानों को बैंकिंग लाइसेंस की जरूरत होगी तो वे बिना किसी बाधा के अपने द्वारा खड़े किए गए बैंकों से कर्ज ले लेंगे. ऐसी उधारी से जुड़ा इतिहास बहुत बुरा रहा है. अहम सवाल यह है कि कोई बैंक कैसे एक गुणवत्ता पूर्ण कर्ज का आवंटन कर सकता है, जब इसका नियंत्रण स्वयं कर्ज लेने वाले के हाथ में है?


राजन और आचार्य ने यह भी कहा कि औद्योगिक घरानों के नियंत्रण वाले बैंक राजनीतिक दबाव में भी आ सकते हैं. इन दोनों ने कहा कि हाल में ही वर्ष 2016 में आए समूह उधारी निदशानिर्देशों में ढील दी गई है. उन्होंने कहा कि इसका भी अंतर कर पाना मुश्किल है कि कर्ज लेने वाली कोई इकाई समूह इकाई का हिस्सा है या नहीं.


आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा, भारत अब आईएलएंडएफएस और यस बैंक की विफलताओं से सबक लेने की कोशिश कर रहा है. आरबीआई के इंटरनल वर्किंग ग्रुप की कई सिफारिशें स्वीकार करने योग्य हैं, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र में भारतीय कारोबारी घरानों को प्रवेश देने की उसकी मुख्य सिफारिश को ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए.


रघुराम राजन और विरल आचार्य ने चेतावनी देते हुए कहा है कि भले ही रिजर्व बैंक बैंकिंग लाइसेंस निष्पक्ष रूप से आवंटित करता है, लेकिन यह उन बड़े व्यापारिक घरानों को अनुचित लाभ पहुंचाने में मदद करेगा जो पहले से ही शुरुआती पूंजी रखते हैं. उन्होंने आगे कहा है कि अत्यधिक कर्ज और राजनीतिक रूप से जुड़े व्यापारिक घरानों के पास लाइसेंस के लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन और क्षमता होगी जो हमारी राजनीति में धन शक्ति के महत्व को और अधिक बढ़ाएगा.

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