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खर्च हो गये 96,337 करोड़ रुपए, फिर भी महाराष्ट्र सूखा का सूखा

Published On :    28 Sep 2020   By : MN Staff
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महाराष्ट्र को सूखा मुक्त राज्य बनाने के लिए करोड़ों रूपये जारी किया जिसमें से 96,337 करोड़ रुपए खर्च हो जाने के बाद भी महाराष्ट्र सूखामुक्त राज्य नहीं बन सका.



मुम्बई : महाराष्ट्र को सूखा मुक्त राज्य बनाने के लिए करोड़ों रूपये जारी किया जिसमें से 96,337 करोड़ रुपए खर्च हो जाने के बाद भी महाराष्ट्र सूखामुक्त राज्य नहीं बन सका. इस बात का खुलासा तब हुआ जब पिछले हफ़्ते महाराष्ट्र विधानसभा में यह रिपोर्ट पेश हुई तो यह मुद्दा खुलकर सामने आया कि पिछले पाँच वर्षों में 96,337 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी अभियान असफल रहा है.

कैग की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2014 में महाराष्ट्र राज्य को सूखामुक्त बनाने के लिए शुरू की गई जलयुक्त शिवार योजना सफल नहीं हो सकी. इस योजना के तहत 2019 तक महाराष्ट्र को सूखामुक्त करने का था. मगर, 2020 बीतने के करीब है लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका. आश्चर्य तो तब हुआ यह पता चला कि वर्ष 2014 से 2019 के बीच महाराष्ट्र में 6,41,000 से अधिक जल संरक्षण कार्यक्रम लागू किये जाने के बाद भी यह योजना विफल रही.

बताया जा रहा है कि राज्य को हर साल 5,000 गाँवों को पानी की समस्या से मुक्त करने के लिए जलयुक्त शिवार अभियान शुरू हुआ था. मगर केवल जुमला साबित हुआ. बातचीत में महाराष्ट्र राज्य योजना आयोग के पूर्व सदस्य और अर्थशास्त्री एचएम देसरदा ने कहा कि दस्तावेजों पर लिखित तौर पैर दर्शाये गए सिद्धांत और घाटी के लिए रिज की वैज्ञानिक पद्धति से बिल्कुल अलग जलयुक्त शिवार अभियान ठेकेदारों द्वारा चलाया जाने वाला पूँजी संग्रहण अभियान था.

देसरदा ने 2015 के सितम्बर माह बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की. इस याचिका में अभियान का आँकलन करने की माँग की गई थी. जलयुक्त अभियान के तहत 25 हज़ार गाँवों को, 6,41,000 श्रम की मदद से आच्छादित या नवीन ढंग से सृजित करने उद्देश्य था. 



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कैग ने 120 गाँवों की जाँच की तो पता चला कि इनमें से 83 गाँवों के लिए जो जल भंडारण ढांचे बनाये गए थे, वह जलापूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं थे. बचे 37 गाँवों के लिए योजना से कम मात्रा में भंडारण बनाये गए. जिसके परिणाम स्वरूप पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की किल्लत का सामना करना पड़ा. कैग की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि जिला अधिकारियों द्वारा तैयार प्रासंगिक रिपोर्ट में इस किल्लत का ज़िक्र ही नहीं किया गया.

जल एवं भूमि व्यवस्थापन संस्था के पूर्व सहायक प्रोफ़ेसर प्रदीप पुरंदरे ने बताया कि राज्य सरकार के स्वायत्त निकाय मृदा एवं जल संरक्षण विभाग द्वारा लागू जलयुक्त शिवार अभियान की अवधारणा ही गलत थी, जो कुछ मौजूदा योजनाओं जैसे नदी-नालों की खुदाई और गहराई की बराबरी कर रहा था. आवश्यकता से अधिक खुदाई और गहराई पानी के प्रवाह में परिवर्तन ला रहे थे. 


नदियों से पानी का बहाव कुँओं में होने की बजाय विपरीत दिशा में हो रहा था. देसरदा की जनहित याचिका के आधार पर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के पूर्व सचिव जॉनी जोसेफ़ की अध्यक्षता में आठ सदस्यों वाली एक समिति का गठन किया. इस समिति के गठन का उद्देश्य अभियान के कामकाज का आँकलन कर रिपोर्ट तैयार करना था. समिति ने इस अभियान को वैज्ञानिक रूप से लागू करने और पहाड़ी ढंग से खेती करने के आदेश के तर्ज पर रिपोर्ट तैयार की.



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पुरंदरे ने रिपोर्ट को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि यह रिपोर्ट जलयुक्त शिवार योजना को दोषमुक्त बताती है, जो कि गलत है. मैं इस रिपोर्ट को नहीं मानता हूँ. पुंदरे कहते हैं, मेरा मुद्दा यह है कि इस अभियान को सुचारु रूप से पुनर्योजित करने के बजाय बंद किया गया. भाजपा के सत्ता में आने पर उन्होंने पिछली सरकार के सिंचाई घोटाले का पर्दाफाश किया। इस अभियान की कमियों को दूर करने के बजाय इसे सिर्फ़ इसलिए बंद कर दिया क्यूंकि यह उनके एजेंडा में नहीं था. यही नहीं मतभेद के कारण भी अभियान अपनी मंज़िल तक पहुँचने में नाकामयाब रहा.


कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि जलयुक्त शिवार ने जल साक्षरता का अच्छा प्रसार किया था. गाँव के लोग अपने तरीके से लघु स्तर पर जल संरक्षण कार्यक्रम चला रहे थे. देसरदा ने यह भी कहा कि फणनवीस सरकार की मनपसंद परियोजना कुछ नौकरशाहों की निगरानी में फलफूल रही थी. यह अभियान बादशाह के चमकीले भड़कीले कपड़ों की तरह दिखावा मात्र था. यह चमकदार कपड़ों से इतर सच बयान करती योजना है.
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