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कोरोना महामारी में पालघर जिले के बच्चे हो रहे कुपोषण का शिकार

Published On :    26 Sep 2020   By : MN Staff
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कोरोना महामारी की चैन तोड़ने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की मार प्रवासी मजदूरों और नौकरीपेशा लोंगों पर पडने के बाद पालघर जिले के बच्चो पर भी इसकी मार पड़ती दिखाई दे रही हैं. कोरोना महामारी के दौरान गरीबी और भुखमरी महाराष्ट्र के पालघर में लोगों को और भी बेबस और लाचार बना चुकी है.



पालघर : कोरोना महामारी की चैन तोड़ने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की मार प्रवासी मजदूरों और नौकरीपेशा लोंगों पर पडने के बाद पालघर जिले के बच्चो पर भी इसकी मार पड़ती दिखाई दे रही हैं. कोरोना महामारी के दौरान गरीबी और भुखमरी महाराष्ट्र के पालघर में लोगों को और भी बेबस और लाचार बना चुकी है. आलम यह है कि वहां पर नन्हें नन्हें बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. जो कुछ भी घर में आता है वह बच्चों को खाने को मिल जाए, इसके लिए परिवार वाले खुद खाने का त्याग कर देते हैं.

अंग्रेजी समाचार चैनल एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, पालघर के कई इलाकों में बच्चों में कुपोषण बड़ी चिंता का विषय बन गया है. बताया गया कि वहां का निवासी उमेश तीन साल का है, पर उसका वजन एक साल के बच्चे के बराबर का है. फिलहाल वह आठ किलो का है, जबकि उसका वजन चार किलो या फिर 33 फीसदी कम है. उसकी लंबाई 84 सेंटीमीटर है, जो 6.6 फीसदी आदर्श स्थिति से कम है.

गांव में सरकारी स्कूल भी नहीं है, जिससे उसके नौ साल के बड़े भाई को वहां पर मिड डे मील में पर्याप्त भोजन मिल सके. तरलपाड़ा के इस परिवार की प्रमिला भांबरे ने अंग्रेजी चैनल को बताया, चार लोगों का पेट भरना काफी मुश्किल भरा हो जाता है. छोटे बच्चे का वजन कम है, इसलिए उसकी अधिक देखभाल करनी पड़ती है.



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ऐसा ही हाल रूपेश और रूपाली का है, जो 13 महीने के जुड़वां बच्चे हैं. इन दोनों का वजन 40 से 42 फीसदी औसत से कम है, जबकि लंबाई भी कम है. इन्हें महज सूखा चावल खाना मिलता है. इनके परिवार की जई तरल ने बताया, हमारे पास पैसा होगा, तब खिलाएंगे न. पैसे ही नहीं हैं. हम सब्जी नहीं खरीद कर खा सकते हैं. बड़े लोगों को भूखा रहना पड़ता है, ताकि छोटे बच्चों को दो वक्त का निवाला मिल सके. बच्चों को तो भूखा नहीं रख सकते हैं न.


जई के परिवार में आठ लोग हैं. उनका बेटा कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम करता था, पर अब काम ही नहीं है, इसलिए परिवार को संघर्ष करना पड़ रहा है. पालघर जिले के जवाहर तालुका में आने वाला तारलपाड़ा में आदिवासी आबादी रहती है, जिनमें से अधिकतर आसपास के इलाकों में प्रवासियों के तौर पर काम करते हैं.



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दरअसल 26 जून 2018 की नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार जिले के मोखाडा, तलासरी, जव्हार, वाडा, दहाणू आदि क्षेत्रों में दहाणू में 30, जव्हार में 20, मोखाडा में 20, विक्रमगढ़ में 12, पालघर में 14, वाडा में 14, तलासरी में 7 और वसई में 9 बच्चों की कुपोषण के चलते मौत हो चुकी है. वहीं इन क्षेत्रों में  457 बच्चों की हालत चिंताजनक बताई गई थी. साथ ही कुपोषण की वजह से लगभग 50 से अधिक बच्चों की जन्म के दौरान ही मौत हो चुकी है. जिले में कुल साढ़े सात हजार बच्चे कुपोषण की चपेट में थे इनमें 3 हजार से अधिक बच्चे कम वजन के पाए गए थे.

बता दें कि महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े जिलों में से एक पालघर जिले में कुपोषण की समस्या नई बात नहीं है. महिला और बाल विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पालघर जिले में अप्रैल 2020 में कुल 2,399 बच्चे कुपोषण की चपेट में आए. जून 2020 में यह संख्या बढ़ी और 2459 हो गई. यानी करीब 2.5 फीसदी की इसमें बढ़ोतरी आई.
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