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मैं भारत की डेमोक्रेसी को लार्जेस्ट डेमोक्रेसी इन द वर्ल्ड, नहीं लार्जेस्ट नौटंकी इन द वर्ल्डकहता हूँ : वामन मेश्राम

Published On :    25 Sep 2020   By : MN Staff
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मैं भारत की डेमोक्रेसी को ‘‘लार्जेस्ट डेमोक्रेसी इन द वर्ल्ड’’ नहीं कहता हूँ, बल्कि ‘‘लार्जेस्ट नौटंकी इन द वर्ल्ड’’ कहता हूँ. यह बात बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने बृहस्पतिवार 24 सितंबर 2020 को बुद्धिस्ट इंटरनेशन नेटर्क के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही.



पुणे : मैं भारत की डेमोक्रेसी को ‘‘लार्जेस्ट डेमोक्रेसी इन द वर्ल्ड’’ नहीं कहता हूँ, बल्कि ‘‘लार्जेस्ट नौटंकी इन द वर्ल्ड’’ कहता हूँ. यह बात बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने बृहस्पतिवार 24 सितंबर 2020 को बुद्धिस्ट इंटरनेशन नेटर्क के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही.


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वामन मेश्राम ने कहा, महाराष्ट्र में जो तमाम हिस्टोरिकल जगह हैं वे बुद्ध स्तूप से संबंधित मौर्य काल के है. उनको खत्म करने की बहुत बड़ी साजिश हो रही है. इस साजिश को रोकने के लिए प्रयास होना. उस्मानाबाद जिले के अंदर जो तेर स्थान पर स्तूप है, उसके बारे में डॉक्युमेंट्री एविडेंस और उसके पुरातत्विक एविडेंस है. हिस्ट्री में यह कहा जाता है कि जिसके पुरातत्विक एविडेंस होते हैं वह ठोस एविडेंस है. उसके आधार पर फैसला किया जाना चाहिए. मगर, इसके बावजूद लॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया कानून के तहत ऐसा हो नहीं रहा है.


इसके अलावा शेगाव के पास बुलढाणा जिले में जो भोन स्तूप है उसको भी बचाया जाना अनिवार्य है, इसके साथ ही तगर अर्थात तेर जो उस्माना जिले में है इसके भी बचाना जरूरी है. पौनी के अंदर जो बौद्ध स्तूप है, इसे भी बचाया जाना जरूरी है. क्योंकि, जो पुरातत्विक एविडेंस होते हैं उसे ठोस एविडेंस माना जाता है. साथ ही कोल्हापुर में मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप है इसे भी बचाया जाना जरूरी है. इसके अलावा अकोला जिले में पातूर में बुद्ध लेनिया मिली है, जैसे सिल्लोड के पास अजंता में एलोरा में मिली है यह उस तरह का है. इस पर आरएसएस कब्जा करना चाहता है.


नासिक का जो त्रीरश्मि लेनी, कार्ले लेनी को भी षडयंत्र पूर्वक समाप्त करने का काम हो रहा है. सोपारा का जो बुद्ध स्तूप है ये सारे एविडेंस पुरातत्वीय एविडेंस हैं. उन्होंने कहा, 24 सितंबर को एक और एतिहासिक दिन है. क्योंकि, 24 सितंबर 1873 को ज्योतिराव फुले के द्वारा सत्यशोधक समाज की स्थापना हुई. सत्यशोध समाज, महाराष्ट्र के सामाजिक, राजनीतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण प्रभाव निर्माण करने वाला आंदोलन था. इस सत्यशोधक आंदोलन को लगभग 147 साल हो गया. इसके साथ ही 24 सितंबर को हमारे लोगों पर पूना पैक्ट थोपा गया. इसके साथ ही 24 सितंबर 1674 को ही छत्रपति शिवाजी महाराज का दूसरा राज्याभिषेक हुआ था. आज के दिन ये तीन बड़ी घटनाएं हैं.


वामन मेश्राम ने कहा, हम लोगों ने बीसवीं शताब्दी के अंत में महाराष्ट्र मेंएक अभियान चलाया था. अभियान का विषय था छत्रपति शिवाजी महाराज के ब्राह्मणी करण से मूलनिवासी बहुजन समाज का ब्राह्मणीकरण एक ब्राह्मणी षड्यंत्र. इस विषय पर हम 10 साल तक लगातार बोलते रहे. लगातार बोलने के पीछे भी एक मकसद होता है. जैसे पानी का एक बूंद अगर पत्थर पर लगातार टपकता रहे तो पत्थर में छेद हो जाता है. पानी की बूंद में धार नहीं है. लेकिन यहां पर निरंतरता का सिद्धांत है कि पानी की बूंद में धार नहीं होने के बावजूद भी पत्थर में भी वह छेद कर देता है, बशर्ते उस काम को निरंतरता से किया जाना चाहिए. 


इसी तरह से मूलनिवासी बहुजन समाज के दिमाग को ब्राह्मणों ने 3000 साल से मूलनिवासी बहुजनों के महापुरुषों ने जो प्रबोधन किया उसके विरोध में दिमाग को ब्रेनवाश करने के लिए प्रति प्रबोधन किया. एंटी प्रबोधन करने के लिए वे लोग हजारों सालों से कोशिश करते रहे. इससे हमारे लोगों के दिमाग में गलत परत चढ़ गया. उदाहरण के लिए जैसे प्याज में कई परत होती है, उसी तरह से पत्तागोभी में भी कई परत होती है. एक निकालो दूसरा नीचे होता है. दूसरा निकालो नीचे और तीसरा होता है और इस तरह से आखिरी तक परत होती है और अंत में वह खत्म हो जाता है.



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उन्होंने कहा, हमारे लोगों के ऊपर यह परत-दर-परत क्यों चढ़ गई? क्योंकि, क्रांति के बाद प्रतिक्रांति हुई और प्रतिक्रांति के बाद मनुस्मृति लिखी गई और मनुस्मृति लिखने के बाद उसमें एक प्रावधान किया गया कि इन लोगों को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं होगा. इसलिए ब्राह्मणों हमारे लोगों को गलत इतिहास, झूठी बात बताना शुरू किया. हमार लोग पढ़े-लिखे नहीं थे, इसलिए प्रतिकार नहीं किए. क्योंकि, प्रतिकार करने के लिए बुद्धि, विवेक बुद्धि नहीं है. इसलि उन्होंने उनकी बातों को समझ नहीं पाए और उनकी बातें हमारे लोगों के ऊपर परत-दर-परत जमा होती चली गई. ब्राह्मणों ने हमारे लोगों के दिमाग की जो भूमि है उसको बंजर बना दिया, बनाने की वजह से हम इस लायक नहीं रहे कि किसको गलत, किसको सही कहे. इसलिए हम लोगों को यह 10 साल तक निरंतर अभियान चलाना पड़ा.


कहा कि ब्राह्मणों ने प्रचार किया छत्रपति शिवाजी महाराज गो प्रतिपालक थे. इसका मतलब है गाय और ब्राह्मणों के रक्षण करने वाले. ऐसा प्रचार ब्राह्मणों ने क्यों किया? क्योंकि ब्राह्मण अपराध बोध की वजह से अंदर से डरे हुए थे, क्योकि उनको डर था कि हमने शिवाजी महाराज को मारा, हमने संभाजी महाराज को मारा, अगर यह बता मराठा लोगों को मालूम हो जाएगा तो मराठा लोग हमारे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे. 


इसलिए मराठा लोगों रोकने के लिए गलत प्रचार किया कि शिवाजी महाराज गाय और ब्राहमण प्रतिपालक थे अर्थात गाय और ब्राह्मणों की रक्षा करते थे. इससे क्या हुआ? इससे यह हुआ कि जो मराठा ब्राह्मणों की बोटी-बोटी करने वाले थे वे लोग ब्राह्मणों की रक्षा करने लगे. यही नहीं मराठा लोग ब्राह्मणों के कर्मकांड करने लगे, हाथों में कलावा बांधने लगे. हाथ में कलावा बांधने का मतलब है कि जैसे तुम्हारे बलि राजा को बांधा था, उसी तरह से तुमको भी बांध रहे हैं. बली शब्द क्या है? हो सकता है कि बलि शब्द बृद्रथ राजा की हत्या के रेफरेंस में आया हो.


उन्होंने आगे कहा कि ब्राह्मणों ने कहा शिवाजी महाराज गाय की रक्षा करते इसलिए मराठों को गाय की रक्षा करना चाहिए. सवाल है कि गाय की हत्या कौन करते हैं? तो ब्राह्मणों ने कहा गाय को काटने का काम मुसलमान करते हैं. अगर गाय को काटने का काम मुसलमान करते हैं तो शिवाजी महाराज ने तुम्हारी जिम्मेदारी गाय की रक्षा के लिए लगाई है. इसलिए गाय की रक्षा करने के लिए मुसलमानों को काटना होगा. यानी ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज के विषयय में झूठा प्रचार करके मराठों को मुसलमानें के विरोध में भड़काने का काम किया. क्योंकि, अगर मराठा मुस्लिम विरोधी हो जायेगा तो ओबीसी तबका मुस्लिम विरोधी हो जायेगा. इस तरहसे उनको ब्राह्मणीकरण करना संभव हो जायेगा.



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ब्राह्मणों ने एक और झूठा प्रचार किया कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदू धर्म की रक्षा करने का भी काम किया था. जब शिवाजी महाराज ने तलवार के बल पर राज्य स्थापित करने की क्षमता अर्जित की और उन्होंने राज्य अभिषेक करने का निर्णय लिया तो पूना के ब्राह्मण जानते थे कि छत्रपति शिवाजी महाराज की जाति कुनबी है, कुनबी वर्ण व्यवस्था में शूद्र होते हैं. इसलिए ब्राह्मण धर्म शास्त्रों के अनुसार शिवाजी महाराज को राजा बनने का अधिकार नहीं है. इसलिए छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक नहीं हो सकता है. जबकि, ब्राह्मण कहते हैं कि रामदास स्वामी, शिवाजी महाराज के गुरु थे. 


अगर गुरू थे रामदास को पहल कर खुद ही शिवाजी महाराज का राज्य अभिषेक करना चहिए था. क्योंकि उनका शिष्य राजा बन रहा है तो उनको खुशी होती. लेकिन, नहीं किया. कोई बात नहीं, वे पूना के ब्राह्मणों को कहते लेकिन पूना के ब्राह्मणों ने नहीं किया. रामदास, शिवाजी महाराज के गुरु नहीं थे. ब्राह्मण ऐसा प्रचार करते हैं यह भी ब्राह्मणीकरण का मामला है.


जब शिवाजी महाराज का राज्य अभिषेक पूना के ब्राह्मण नहीं किया तो महाराज ने अपना एक बहुत विश्वस्त आदमी वाराणसी में ब्राह्मण गागा भट्ट के यहां भेजा. सारी बाते बताई. तब गागा भट्ट ने गागा भट्टी नाम का किताब लिखा और उस किताब में शिवाजी महाराज की वंशावली को राजस्थान के सिसोदिया घराने से जोड़ दिया. ऐसी जानकारी है कि राजस्थान के राजपूत नाग लोग हैं और शिवाजी महाराज भी नाग हैं. राजबाड़ी कहते हैं कि महाराष्ट्र की स्थापना नाग लोगों ने की है. 


आपको याद होगा नाग पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है. यह परंपरा से मनाया जाने वाला त्यौहार है. लेकिन, ब्राह्मणों के कैलेंडर में नागपंचमी को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है और ब्राह्मण कभी नाग पंचमी का त्यौहार नहीं मनाते हैं. इस तरह से ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज का राज्यभिषेक वर्ण के आधार पर निर्धारित किया. वर्ण के अनुसार शिवाजी महाराज कुनबी हैं और कुनबी शुद्र होते हैं. शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नहीं है, इसलिए उनका राज्याभिषेक नहीं हो सकता है. इस तरह सेयह बात सिद्ध होती है छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में हिंदू धर्म नाम का कोई धर्म वजूद में नहीं था, ब्राह्मण उसको वर्ण धर्म कहते थे.


वामन मेश्राम ने कहा, आज की तारीख में जो हिंदू धर्म शब्द प्रचलित है, उस समय के धर्म को ब्राह्मण क्या कहते थे? वण धर्म. वर्ण धर्म का वास्तविक नाम ब्राह्मण धर्म है. जब उस समय हिंदू धर्म नाम का कोई धर्म ही वजूद में नहीं था तो शिवाजी महाराज हिंदू धर्म की रक्षा कैसे करते थे? यह बात झूठ है. इसमें एक और खास बात यह है कि आज की तारीख में शिवाजी महाराज के हाथ में भगवा झंडा है. बाबासाहेब आंबेडकर जोहर लिखते थे, जय भवानी लिखते थे. 


आज भी झारखंड के आदिवासी जोहार लिखते हैं, उत्तर प्रदेश के लोग भी जोहार बोलते हैं. राजस्थान में भी जोहार कहते हैं. इसका मतलब है कि बाबासाहब अंबेडकर ने जो जोहार कहते थे यह शब्द योद्धार से जोहार बना है. योद्धार शब्द, युद्ध से रिलेटेड है. युद्ध भूमि में युद्ध के लिए ऐलान करने के लिए शायद इस शब्द का उपयोग किया जाता होगा, कहा जा सकता है. इसी तरह से भगवा शब्द भी पाली का शब्द है. भगवा को केसरी भी कहा जाता है. केसरी का मतलब पूरा जीवन समर्पित करना है.


ज्योतिराव फुले ने जो लाइन निर्धारित की उसी लाइन पर बाबासाहब ने काम किया. अगर बाबासाहब ने काम नहीं किया होता तो सविधान नहीं होता. 1873 को जो आंदोलन जोतिराव फुले ने किया उस आंदोलन का हमारे लोगों के भविष्य पर दीर्घकालीन परिणाम करने वाली बात है. 17 अगस्त 1932 बाबासाहेब आंबेडकर लड़ाई लड़कर सेपरेट इलेक्ट्रेड का अधिकार हासिल किया. उस समय बाबासाहेब आंबेडकर की उम्र 41 साल थी. सेपरेट इलेक्ट्रेड अर्थ बहुत लोगों को समझ में नहीं आता है. 



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हम अछूत ब्राह्मणों के गुलाम थे. बाबासाहेब आंबेडकर ने इन गुलामों को आजाद करने के लिए कहा ब्राह्मणों से सेपरेट करो. सेपरेट अंग्रेजी शब्द है, इसका हिंदी अर्थ है है अलग करो. अगर अछतों को ब्राह्मणों से अलग किया जाएगा और अलग होते ही अछूत ब्राह्मणों की गुलामी से आजाद हो जाएंगे. आजाद होने के लिए बाबासाहेब अंबेडकर ने और आगे कहा सेपरेट में इलेक्ट्रोड में अछूतों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होगा. क्योंकि, अछूतों के भविष्य को निर्धारित करने का अधिकार ब्राह्मणों के पास था. 


अछूतों का भविष्य क्या होगा? यह निर्धारित करने का अधिकार अब ब्राह्मणों के पास नहीं होगा. सेपरेट करने के बाद अछूत अपने भविष्य का फैसला लेने का निर्णय करेंगे. अछूतों का प्रतिनिधि कौन होगा? ब्राह्मण निर्धारित नहीं करेंगे. अछूतों का प्रतिनिधि कौन होगा वह खुद चुनेंगे. इसका मतलब है कि 1932 को बाबासाहेब आंबेडकर ने ब्राह्मणों की गुलामी से आजाद कर दिया. अंग्रेज आने के बाद अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया. यह बात सही नहीं है. अंग्रेजों के पहले ही हम लोग ब्राह्मणों के गुलाम थे.


बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा, गांधी को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली यानी 15 साल बाद गांधी को आजादी मिली. इसका मतलब यह हे कि बाबासाहेब आंबेडकर ने 40 साल की उम्र में हमारे लोगों को आजाद करने का काम किया. इसके विरोध में गांधी ने पूना पैक्ट किया. पैक्ट इस आजादी को खत्म करने के लिए षड्यंत्र है. इसलिए मैं गांधी को शैतान कहता हूँ.


इस देश में 3.5 प्रतिशत ब्राह्मण है. लेकिन, पचासी प्रतिशत बहुजन लोगों पर राज कर रहे हैं. यह सब ज्वाइंट इलेक्टोरट की वजह से संभव हो सका. क्योंकि पूना पैक्ट ने दलाल और भड़वे पैदा किया. पूना पैक्ट एससी, एसटी में लागू किया, ओबीसी में लागू किया और मुसलमानों में भी पूना पैक्ट सिद्धांत लागू कर दिया. इस तरह से इंडिया में जो डेमोक्रेसी है उसका प्रचार किया जाता है ‘‘लार्जेस्ट डेमोक्रेसी इन द वर्ल्ड’’. लेकिन मैं इसे ‘‘लार्जेस्ट नौटंकी इन द वर्ल्ड’’ कहता हूँ.


अंत मे कहा कि, मूलनिवासियों की 6000 जातियों को जोड़ने और उनकी विरासत को बचाने के लिए आंदोलन करना होगा. यह आंदोलन देशव्यापी आंदोलन करना होगा. इसके लिए 5 अक्टूबर को जिलाधिकारी कार्यालय में धरन-आंदोलन करना होगा और 12 अक्टूबर को एक साथ 366 तहसील कार्यालय पर धरना आंदोलन करना होगा.

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