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झूठे आरोपों की मानसिक प्रताड़ना के लिए कार्यकर्ताओं को मुआवजा दे छत्तीसगढ़ सरकार : एनएचआरसी

Published On :    7 Aug 2020   By : MN Staff
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मानवाधिकारों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को एक-एक लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है.



नई दिल्ली : राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मानवाधिकारों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को एक-एक लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है. छत्तीसगढ़ पुलिस ने सुकमा जिले के नामा गांव में शामनाथ बघेल नाम के एक शख्स की हत्या के आरोप में पांच नवंबर 2016 को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, मंजू कोवासी, विनीत तिवारी, संजय पराते और मंगला राम कर्मा के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं, आर्म्स एक्ट और यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था.


ऐसा बताया गया कि यह मामला मृतक की पत्नी विमला बघेल की लिखित शिकायत पर दर्ज किया गया लेकिन इसके प्रमाण हैं कि महिला ने अपनी शिकायत में किसी को नामजद नहीं किया.

बता दें कि पीपुल यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की शिकायत के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 13 मार्च को मुआवजा दिए जाने का आदेश जारी किया, लेकिन इस आदेश की प्रति पीयूसीएल को पिछले महीने ही प्राप्त हुई है. 


सुप्रीम कोर्ट ने 15 नवंबर 2016 को इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारी से संरक्षण दिया था. छत्तीसगढ़ सरकार ने इस मामले की जांच करने या इसे खत्म करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया इसलिए इन कार्यकर्ताओं ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस मामले की जांच की और हत्या के मामले में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भूमिका न पाए जाने पर फरवरी 2019 में आरोप वापस लेते हुए एफआईआर से नाम हटा लिए.



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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले में संज्ञान लिया और पुलिस द्वारा इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का पुतला जलाए जाने और बस्तर के तत्कालीन आईजी कल्लूरी की धमकी को नोट किया था. बता दें कि आईजी कल्लूरी ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘बस्तर में घुसने पर पत्थरों से मारे जाने को लेकर’ धमकी दी थी. छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर कोई मामला नहीं होने पर आयोग ने फरवरी 2020 में कहा था, हमारी दृढ़ राय है कि पुलिस द्वारा इन लोगों के खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज किए जाने के कारण वे निश्चित तौर पर मानसिक रूप से परेशान और प्रताड़ित हुए हैं और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है.



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एनएचआरसी ने आगे कहा, छत्तीसगढ़ सरकार को इसका मुआवजा देना चाहिए इसलिए हम मुख्य सचिव के जरिये छत्तीसगढ़ सरकार से सिफारिश करते हैं और निर्देश देते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंजू और मंगला राम कर्मा को एक-एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए. छत्तीसगढ़ सरकार ने इनके मानवाधिकारों का बुरी तरह से उल्लंघन किया है. आयोग ने इसी तरह का मुआवजा देने का निर्देश तेलंगाना के अधिवक्ताओं की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम को भी दिया है, जिन्हें लगभग सात महीने सुकमा जेल में रखने के बाद सभी आरोपों से बरी कर दिया था.
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