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नागरिकता कानून के नियम बनाने के लिए तीन महीने का दे और समय

Published On :    3 Aug 2020   By : MN Staff
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गृह मंत्रालय की मांग



नई दिल्ली : केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विवादित संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) संबंधी नियम बनाने के लिए तीन महीने की और मांग की है. अधिकारियों ने रविवार को कहा कि इस संबंध में विधान संबंधी स्थायी समिति से संबंधित विभाग को आवेदन दिया गया है. नियम के तहत किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के छह महीने के भीतर उससे संबंधित नियम बनाए जाने चाहिए, या तो समयावधि विस्तार की अनुमति ली जानी चाहिए. विधेयक पर राष्ट्रपति ने बीते साल 12 दिसंबर को हस्ताक्षर किए थे.

इस बाबत एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, गृह मंत्रालय ने सीएए पर नियम बनाने के लिए तीन महीने का समय और मांगा है. इस संबंध में आवेदन अधीनस्थ विधान संबंधी स्थायी समिति विभाग के समक्ष दिया गया है. उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय ने यह कदम तब उठाया जब समिति ने सीएए को लेकर नियमों की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी. समिति द्वारा इस अनुरोध को स्वीकार कर लिए जाने की उम्मीद है.


अधिकारी ने बताया कि सीएए का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफग़ानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भारत आए हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध, पारसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देना है.छह धर्मों के जो लोग धार्मिक उत्पीड़न की वजह से यदि 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए तो उन्हें अवैध प्रावासी नहीं माना जाएगा. उन्हें भारतीय नागरिकता दी जाएगी.



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संसद से सीएए के परित होने के बाद देश में बड़े पैमाने पर इसके खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले थे. सीएए विरोधियों का कहना है कि यह धर्म के आधार पर भेदभाव करता है और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है. विरोधियों का यह भी कहना है कि सीएए और एनआरसी का उद्देश्य केवल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना नहीं बल्कि एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय को नागरिकता से वंचित करना हैं. संसदीय कार्य नियमावली के मुताबिक कानून के लागू होने के छह महीने के भीतर स्थायी नियम और उप-कानून बन जाने चाहिए.

बता दें कि सीएए के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफग़ानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भारत आए गैर मुस्लिम शर्णार्थियों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है. हालांकि इसमें मुस्लिमों का जिक्र नहीं हैं. इस विधेयक को करीब आठ महीने पहले संसद ने मंजूरी दी थी जिसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन हुए थे. जब आसाम में एनआरसी लागू की गई तो वहा कुल 19 लाख लोगों को एनआरसी की सूची से बहार कर दिया गया. 



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इसमें करीब 5 लाख मुस्लिम हैं और 14 लाख एससी, एसटी और ओबीसी के लोग हैं. यानी असम में एनआरसी की सबसे ज्यादा झटका एससी, एसटी और ओबीसी को लगा. यही वजह हैं की यह मुस्लिमों की नागरिकता मसला नहीं बल्कि एससी, एसटी ओर ओबीसी के नागरिकता से जुड़ा हुआ मामला हैं. इसलिए मुस्लिमों सहित एससी, एसटी और ओबीसी के लोग इस कानून का कड़ा विरोध कर रहे हैं.
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