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केवल जुमला न साबित हो नई शिक्षा नीति, इसमें किए गए दावें पर यकीन करना कठीन, विशेषज्ञों की राय

Published On :    3 Aug 2020   By : MN Staff
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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के मंजूरी मिल चुकी है. इसमें सभी बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने, स्कूल से निकलने वाले हर छात्र को रोज़गार मिलने का प्रावधान किया गया हैं.



नई दिल्ली : नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के मंजूरी मिल चुकी है. इसमें सभी बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने, स्कूल से निकलने वाले हर छात्र को रोज़गार मिलने का प्रावधान किया गया हैं. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करने का वादा भी किया गया है, लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस नीति में दावे तो बहुत किए गये हैं, लेकिन इस बात की कोई जानकारी नहीं दी गई है कि जिस देश में सभी स्कूलों को अब तक पक्की छत तक उपलब्ध न कराई जा सकी हो, लाखों विद्यालय केवल एक शिक्षक के सहारे चलते हों, वहां इतने बड़े लक्ष्य को हासिल कैसे किया जाएगा. ऐसे में आशंका है कि कहीं यह बड़ा दावा एक और जुमला साबित होकर न रह जाए.   

   
कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि यूपीए-2 के अंतिम वर्ष में शिक्षा पर जीडीपी का 4.14 प्रतिशत खर्च किया गया था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस खर्च को लगातार घटाया और अब यह केवल 3.2 प्रतिशत रह गया है. इससे सरकार की कथनी और करनी में बड़ा फर्क साफ दिखाई पड़ रहा है. वहीं, अर्थशास्त्री गौरव वल्लभ कहते हैं कि सरकार ने उच्च शिक्षा में प्रवेश न्यूनतम 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि नई शिक्षा नीति से पढ़कर निकले छात्र बाजार की चुनौतियों के लिए कितने सक्षम होंगे. यहां इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि एएसईआर की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले 50 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की पुस्तक भी नहीं पढ़ पाते.


इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि पाँचवीं कक्षा तक के 72 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के सवाल भी हल नहीं कर पाते. एम्प्लॉयमेंट सर्वे के मुताबिक 80 प्रतिशत इंजीनियर किसी नौकरी के योग्य नहीं हैं. ऐसे में केवल छात्रों को ऑनलाइन के माध्यम से डिग्री देना आसान है, लेकिन उनकी शिक्षा की गुणवत्ता कैसे तय की जाएगी, सरकार को इस बारे में ज्यादा स्पष्ट विचार रखना चाहिए.  



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केंद्र सरकार ने सौ प्रतिशत नामांकन के लिए ऑनलाइन और पत्राचार के जरिए शिक्षा देने का विचार किया है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि देश में इंटरनेट और कंप्यूटर की पहुंच समाज के बड़े तबके तक नहीं है. यहां तक कि सरकार के स्कूलों तक में इनकी उपलब्धता आज तक नहीं सुनिश्चित हो सकी है. ऐसे में सबको ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा देने की बात कल्पनात्मक लगती है. यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन ऑन स्कूल एजुकेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल 9.85 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में ही कंप्यूटर है और केवल 4.09 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट पहुंच पाया है. ऐसे में सरकार यह लक्ष्य कैसे पूरा करेगी?  


ऋतु चौधरी कहती हैं सरकार उच्च शिक्षा को बोर्ड ऑफ गवर्नर के जरिए संचालित करने की बात कह रही है. अब तक के अनुभव से क्या इस बात की आशंका नहीं बनती है कि इस बोर्ड में केवल एक विशेष विचारधारा को मानने वाले लोग होंगे और उसके सहारे देश को हांकने की कोशिश की जाएगी. उन्होंने कहा कि सरकार के इरादे ठीक नहीं हैं और इसके जरिये देश के भगवाकरण की तैयारी की जा रही है.



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नई शिक्षा नीति में सबसे बड़ा बदलाव तीन साल से छह साल की उम्र के छोटे बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए औपचारिक शिक्षा में प्रवेश को लेकर माना जा रहा है. लेकिन क्या आंगनबाड़ी केंद्र इसके लिए दक्ष हैं? आंगनबाड़ी केंद्रों की शुरूआत शिक्षा से वंचित बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें कुपोषण से बचाने के लिए की गई थी. आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं शिक्षण कार्य में भी दक्ष नहीं होते. ऐसे में उनसे इस बात की उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे देश के बच्चों की शिक्षा नींव बेहतर ढंग से रख सकेंगे.  


दिसंबर 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 3 लाख 62 हजार 940 आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय की सुविधा तक नहीं है और एक लाख 59 हजार 568 केंद्रों में पीने के लिए साफ जल तक उपलब्ध नहीं है. ऐसे में इन केंद्रों के सहारे देश के करोड़ों बच्चों को उचित शिक्षा देने के दावे पर सवाल उठना स्वाभाविक है.  


प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक, मेडिकल से लेकर इंजीनियरिंग तक हर जगह शिक्षकों की कमी है. अनेक प्राथमिक विद्यालय केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं. 3 जुलाई 2018 तक देश में 10 लाख अध्यापकों की कमी थी. आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते नई नियुक्तियां लगातार टाली गईं और वर्तमान समय में यह कमी और अधिक बढ़ चुकी है. ऐसे में यह कैसे संभव हो पाएगा कि सरकार अचानक से देश में शिक्षकों की सारी कमी पूरी कर दे.



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दिल्ली विश्वविद्यालय एकेडेमिक काउंसिल के सदस्य राजेश झा कहते हैं कि इसी सरकार ने चंद दिनों पहले सभी विश्वविद्यालयों को अपने स्तर पर बाजार से फंड की व्यवस्था करने के निर्देश दिए थे. यह साबित करता है कि उसके पास उच्च शिक्षण संस्थानों का खर्च उठाने की हालत नहीं रह गई है. ऐसे में अचानक सरकार के पास इतना धन कहां से आएगा कि वह जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करते हुए इतना बड़ा लक्ष्य हासिल कर ले. उन्होंने कहा कि इन चीजों को देखकर सरकार के दावों पर यकीन करना कठिन है.

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