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ओबीसी के साथ फिर से धोखेबाजी

Published On :    22 Feb 2020   By : MN Staff
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शिक्षा और नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण खत्म, ओबीसी क्रीमीलेयर की सीमा बढ़ाकर 11 लाख करने पर विचार कर रही सरकार



नई दिल्ली । देश में मनुवादी सरकारें 52 प्रतिशत ओबीसी के साथ धोखेबाजी करने में अब तक कोई कसर नहीं छोड़ी है. सरकारें ओबीसी के साथ लगातार धोखेबाजी करते आ रही है चाहे ओबीसी की जाति आधारित जनगणना की बात हो या क्रीमीलेयर के माध्यम से ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण खत्म करने की बात हो. 


केन्द्र की संघ संचालित मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है तब से लगातार ओबीसी विरोधी न केवल फैसले ले रही है, बल्कि नाजायज कानून बनाकर ओबीसी को हर अधिकार से वंचित भी कर रही है. हालांकि, ओबीसी के साथ धोखेबाजी करने का काम केवल बीजेपी सरकार ही नहीं कर रही है. बल्कि इसके पहले कांग्रेस भी करते आई है. यानी कांग्रेस और बीजेपी दोनों मिलकर ओबीसी का सत्यानाश कर रहे हैं और ओबीसी धर्म और आस्था की चादर ओढ़कर चुप्पी साधे बैठा है.


ओबीसी की चुप्पी के कारण अब एक बार फिर से मोदी सरकार उनके साथ धोखेबाजी करने जा रही है. ओबीसी आधारित जनगणना पर रोक लगाने के बाद अब मोदी सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) क्रीमी लेयर की आय सीमा बढ़ाकर 8 लाखा सालाना से 11 लाख करने पर विचार कर रही है. 


सरकार ने सिफारिश की है कि ‘सैलरी’ को ‘ग्रॉस इनकम’ का ही हिस्सा माना जाना चाहिए. सैलरी को ‘ग्रॉस इनकम’ का हिस्सा मानने पर ओबीसी वर्ग के व्यक्ति को सरकारी नौकरियों और एजुकेशन में मिलने वाले आरक्षण पूरी तरह से खत्म हो जायेंगे. यह बात ओबीसी को अभी तक समझ में नहीं आ रही है. 


गौरतलब है कि बीते हफ्ते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में मंत्रियों के एक समूह को ओबीसी के बीच क्रीमीलेयर को परिभाषित करने और निर्धारित 8 लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा को संशोधित करने का काम सौंपा गया था. इस आधार पर अब सरकार क्रीमीलेयर को परिभाषित करते हुए ओबीसी की वार्षिक आय सीमा को 8 लाख से बढ़ाकर 11 लाख तक ग्रास लेवल पर बढ़ाने जा रही है.


टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक, मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट ने एक एक्सपर्ट कमेटी के सुझावों पर ही ओबीसी के लिए क्रीमीलेयर की गणना में वेतन के समावेश की सिफारिश की गई है. अगर, किसी की सालान इनकम 11 लाख से ज्यादा है तो उसे ओबीसी क्रीमीलेयर के तहत शिक्षा और नौकरियां में आरक्षण नहीं मिलेगा. जिनकी सलाना इनकम 11 लाख से नीचे होगा, उनको क्रीमीलेयर के दायरे से बाहर रखा जायेगा.


बता दें कि क्रीमीलेयर, ओबीसी वर्ग को शिक्षा और नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण को पूरी तरह से खत्म करने का मामला है. इस षड्यंत्र को इस तरह से समझा जा सकता है कि क्रीमीलेयर में ओबीसी वर्ग के उन व्यक्तियों को रखा जिनकी इनकम ज्यादा है. क्योंकि, इनकम ज्यादा होने से ही वे अपने बच्चों को आईएस, आईपीएस, आईआरएस, डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसी उच्च शिक्षा दे सकते हैं और नौकरियों में बड़े-बड़े पदों पर जा सकते हैं. 


लेकिन, उनके बच्चे आईएस, आईपीएस, आईआरएस, डॉक्टर, वकील और इंजीनियर इत्यादि ना बनें, इसलिए मनुवादी सरकार उनको क्रीमीलेयर के दायरे में रखकर उनको शिक्षा और नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण को खत्म कर दिया. सरकार ने उन लोगां को क्रीमीलेयर से बाहर रखते हुए आरक्षण दिया, जिनकी इनकम 8 लाख या उससे भी कम है. यानी जिनकी इनकम कम है वो अपने बच्चों को आईएस, आईपीएस, आईआरएस, डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसी उच्च शिक्षा नहीं दे सकते हैं, उनको शिक्षा और नौकरियां में आरक्षण दिया जायेगा.


अब सवाल है कि कम इनकम वाले जब अपने बच्चों को आईएस, आईपीएस, आईआरएस, डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसी उच्च शिक्षा ही नहीं दे सकते हैं तो उनको नौकरियां कहां से मिलेगी? जब उनको शिक्षा और नौकरी ही नहीं मिलेगी तो आरक्षण का क्या कोई फायदा है? जबकि, वहीं जो अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दे सकता है तो उसको शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण नहीं दिया जा रहा है और जो अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकता है उनको शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिया जा रहा है.


इसका मतलब साफ है कि मनुवादी सरकार ओबीसी को एक हाथ से आरक्षण दे रही है और दूसरे हाथ से आरक्षण को खत्म कर रही है. यही बात ओबीसी के नेताओं को समझ में नहीं आ रही है कि संघी सरकार उनके साथ धोखेबाजी कर उनको अधिकार वंचित कर रही है.


ओबीसी के अधिकार के लिए डॉ.अम्बेडका का इस्तीफा
यह भी बता दें कि ओबीसी के आधिकार के लिए ही डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने 1951 को अपने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. यह बात बहुत कम लोग जाने होंगे, कि ओबीसी के अधिकार के लिए कानून मंत्री पद से इस्तीफा देने वालें पहले व्यक्ति हैं. बाबासाहब ने ओबीसी की पहचान कर उनको उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण देने के लिए ब्राह्मणी कांग्रेस पर दबाव डाला, लेकिन ब्राह्मण प्रधानमन्त्री नेहरू सरकार पटेल को सामने खड़ा कर ओबीसी की पहचान का विरोध करवाया और तैयार नहीं हुआ. 


इसीलिए बाबासाहब ने अपने कैबिनेट मंत्री पद इस्तीफा दे दिया. जब बाबासाहब को संविधान लिखने का मौका मिला तब उन्होंने संविधान में आर्टिकल 340 में ओबीसी की पहचान के लिए प्रावधान किया कि राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया जाता है कि ओबीसी कौन हैं? इनकी पहचान के लिए कमिटि गठित करे.


डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर के दबाव के कारण बाद में काका कालेलकर को ओबीसी की जातियों को पहचान के लिए कमिशन बनाया गया. इसके बाद भी ब्राह्मणों ने ओबीसी के लिए नियुक्त काका कालेलकर कमीशन 1953-1955 के रिपोर्ट को संसद में बहस के लिए नहीं रद्दी की टोकरी में डाल दिया. 


इसके बाद 1978 में ओबीसी के लिए दूसरा कमीशन बीपी मंडल की अध्यक्षता में नियुक्त किया गया. लेकिन, 1991 तक मंडल रिपोर्ट सचिवालय की अलमारी में धुल खाते रहा. अंततः 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने देश के 52 प्रतिशत ओबीसी मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया और उनको यह 27 प्रतिशत आरक्षण भी नहीं मिलना चाहिए इसके लिए उन्हांने ओबीसी के ऊपर क्रीमीलेयर थोप दिया. ब्राह्मणों ने इसी तरह से ओबीसी की जाति आधारित गिनती पर भी रोक लगाते आ रहे हैं.



यह भी  पढ़े : असम में एनआरसी सूची पर नया विवाद



क्या अपने अधिकार के लिए ओबीसी ने आंदोलन किया?
ओबीसी के अधिकारों को खत्म करने का सिलसिला आज से नहीं 1931 से ही चली आ रही है. अंग्रेज 1931 तक सभी जातियों की गिनती कराते थे, लेकिन उनके जाने के बाद ब्राह्मणों ने रोक लगा दी. ओबीसी को किसी भी तरह का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, इसलिए ब्राह्मणों  ने धर्म के नाम पर गुमराह किया और उनको मंडल कमीशन के विरोध में कमंडल आंदोलन में डायर्वट कर दिया. इससे ओबीसी अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने के बजाए राम मंदिर में लग गया. 


यही कारण रहा कि 1992 में 52 प्रतिशत ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला. यही नहीं 27 प्रतिशत आरक्षण का भी लाभ ओबीसी को नहीं मिलना चाहिए, इसलिए ब्राह्मणों ने क्रीमीलेयर का षड्यंत्र किया. इसके बाद भी ओबीसी अपने अधिकार के लिए आज तक सड़कों पर नहीं उतरा. 

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