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भारत में बढ़ता जा रहा अमिरों और गरीबोें के बीच आर्थिक असमानता का फासला सिफ 63 लोगों के पास देश के बजट से ज्यादा पैसा

Published On :    20 Jan 2020   By : MN Staff
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‘टाइम टू केयर’ नामक रिपोर्ट में चौकाने वाली जानकारी स्विटजरलैंड के दावोस में डब्ल्यूईएफ की एक सलाना बैठक में पेश ‘टाइम टू केयर’ नाम की इस रिपोर्ट से ऑक्सफेम कंफेडरेशन ने चौंकाने वाली जानकारियां सामने आयी है.



दावोस : देश में आझादी के बाद आर्थिक समता को स्वीकारने के बाद भी असमानता की दरी दिन ब दिन चौड़ी होती जा रही है. एक तरफ  जहा देश में गरीबों को खाने के लाले पड़ रहे, वही दुसरी तरफ इस देश का धन मूठभर लोगों के पास जमा हो रहा है. इससे गरीबों और अमिरों के बीच फासला कम होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है. 


देश के एक फीसदी बेहद अमीर लोगों के पास देश के कुल 95.3 करोड़ लोगों से करीब चार गुना ज्यादा संपत्ति है. इन धनकुबेरों के पास इतनी संपत्ति है कि इसमें देश का पूरे एक साल का बजट बन जाए. विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) की सालाना बैठक में जारी एक स्टडी में ये बात सामने आई है.


स्विटजरलैंड के शहर दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 50वीं सलाना बैठक में ऑक्सफेम  कंफेडरेशन ने ‘टाइम टू केयर’ नाम से ये रिपोर्ट प्रकाशित की है. रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के कुल 2,153 धनकुबरों के पास धरती की कुल आबादी का 60 फीसदी हिस्सा रखने वाले 4.6 अरब लोगों से भी ज्यादा संपत्ति है. 


इस रिपोर्ट में ऑक्सफेम ने भारत को लेकर कहा कि यहां के 63 अरबपतियों के पास देश के कुल बजट से ज्यादा संपत्ति है. इसमें वर्ष 2018-19 के बजट का संदर्भ दिया गया है, जो 24 लाख 42 हजार दो सौ करोड़ रुपये थे.


रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है. ज्यादातर अमीरों की संपत्ति एक दशक में दोगुनी हो गई है, जबकि संयुक्त रूप से देखा जाए तो उनकी संपत्ति बीते एक साल में कुछ कम हुई है.



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‘टाइम टू केयर’ रिपोर्ट को पेश करने वाले ऑक्सफेम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर कहते हैं, ’अमीरों और गरीबों के बीच फासला बढ़ता जा रहा है, जिसे असमानता को कम करने वाली नीतियां लाए बिना खत्म नहीं किया जा सकता. बहुत कम सरकारें ऐसा कर रही हैं.’


पांच दिन चले विश्व आर्थिक मंच के सालाना बैठक में आय और लैंगिक असमानता पर भी चर्चा हुई. इसके अलावा इस बैठक में पेश की गई ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट की आशंका भी जाहिर की गई. रिपोर्ट में कहा गया कि साल 2019 में सूक्ष्म अर्थशास्त्र में बढ़ती कमजोरी और वित्तीय असमानता इसकी वजह हो सकती है. इसके चलते दुनिया की लगभग आधी अर्थव्यवस्था प्रभावित होने का डर है.


स्टडी में 163 इंडस्ट्रियल एरिया और उनकी सप्लाई सीरीज का भी विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि दुनिया की लगभग आधी जीडीपी प्रकृति पर या उससे मिलने वाली सेवाओं पर निर्भर है. उदाहरण के तौर पर परागण, जल गुणवत्ता और बीमारियों पर नियंत्रण तीन ऐसी प्राकृतिक सेवाएं हैं, जो इको-सिस्टम मुहैया करा सकती है. रिपोर्ट के अनुसार प्रकृति पर दुनिया की 44,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था निर्भर है.

आझादी के बाद देश में जो सरकारे बनी उन्होंने भी गरीबी हटाओ का नारा दिया था. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है की इस देश की गरीबी हटने की बात तो दुर कम भी नहीं हो सकी. देश में नीतीया बनाने वाले लोग उद्योगपतीओं के समर्थन में नीतीया बनाने की वजह से और जातिवाद जिंदा होने की वजह से गरीबों और अमिरों के बीच आर्थिक असमानता की खाई और चौड़ी होती जा रही है. नोबल पारिताषिक विजेता डेटान ने भी कहा है की भारत में जातिप्रथा गरीबी का मूल कारन है.

देश में दो बाते एक साथ हो रही है, जो नहीं होनी चाहिए. एक तरफ देश का विकास दर भी बड़ रहा है और दुसरी तरफ देश में गरीबी भी बढ़ रही है. हकीकत यह है की जब देश का विकास दर बढ़ता है तब देश की गरीबी कम होती है. लेकिन भारत में इसके ठीक विपरित हो रहा है. इसे दुनया के अर्थशास्त्री लोग भी समझ नहीं पा रहे है.
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