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देश में कुप्रथा का दंश

Published On :    17 Nov 2019   By : MN Staff
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कमजोर कानून के चलते भारत में जारी है हाथ से मैला सफाई की प्रथा : रिपोर्ट



कोच्चि : विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) एवं अन्य के एक अध्ययन के अनुसार ‘कमजोर कानूनी संरक्षण और उसे लागू करने में इच्छाशक्ति की कमी’ के कारण भारत में हाथ से मैला सफाई की प्रथा अब भी जारी है. जबकि, 2013 में एक कानून बनाकर इस प्रथा को प्रतिबंधित किया गया था.



‘हेल्थ, सेफ्टी एंड डिग्निटी ऑफ सैनिटेशन वर्कर्स एन इनिशियल एसेसमेंट’ शीर्षक से अध्ययन में कहा गया है कि भारत में सफाईकर्मियों की आर्थिक स्थिति ‘गंभीर’ है और यह ‘जातिगत व्यवस्था’ से संबंधित रोजगार है.विश्व बैंक, डब्ल्यूएचओ, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (डब्ल्यूएलओ) और एक अंतरराष्ट्रीय विकास संगठन ‘वाटरएड’ द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन में भारत एवं आठ अन्य देशों में सफाईकर्मियों की स्थिति के साक्ष्य के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है.


 यह अध्ययन 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस से पांच दिन पहले गुरुवार को जारी किया गया. इसमें बांग्लादेश, बुर्किना फासो, हैती, केन्या, सेनेगल, दक्षिण अफ्रीका और युगांडा सहित अन्य देश शामिल हैं.
अध्ययन में कहा गया है, कई देशों में सफाईकर्मियों के हितों की रक्षा करने वाले कानून और नियमों की कमी है या कानून को सही तरीके से लागू नहीं किया गया है या फिर व्यवहारिक रूप से ये प्रभावी नहीं हैं. 


हाथ से मैला सफाई अक्सर जोखिम भरा सफाई कार्य है. हैरान करने वाली रिपोर्ट यह भी है कि भारत में हाथ से मैला सफाई वाले कुछ सफाईकर्मियों को श्रम के एवज में पैसे के बजाय भोजन दिया जाता है. अध्ययन में यह भी कहा गया है कि सफाईकर्मियों को अक्सर सामाजिक भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ता है.



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इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि 2013 के कानून ‘हस्त सफाई कर्मियों के रोजगार निषेध एवं उनके पुनर्वास’ में किसी भी तरह से हाथ से मैला सफाई पर प्रतिबंध लगाया गया है. रमेश ने मीडिया को बताया, हमें निश्चित रूप से इसे (कुप्रथा को) कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति अपनानी चाहिए. 



2013 में संसद में संप्रग सरकार ने जब यह विधेयक पारित किया तब रमेश ग्रामीण विकास मंत्री थे. जुलाई 2019 में संसद से दिए गए जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने कहा था कि सरकार को देश में 18 राज्यों में 170 जिलों से हाथ से मैला सफाई के 54,130 मामलों का पता चला है.



रिपोर्ट के अनुसार देश में हर पांच दिन में तीन सफाईकर्मियों की मौत होती है. सेप्टिक टैंकों और सीवर में जहरीली गैस से सफाईकर्मी बेहोश हो सकते हैं या उनकी मौत भी हो सकती है. वाटरएड इंडिया के नीति प्रमुख रमन वीआर ने कहा कि सफाईकर्मी समाज में सबसे अधिक आवश्यक लोकसेवा करते हैं और अब भी वे ऐसी स्थिति में काम करते हैं जो उनके स्वास्थ्य, जीवन और प्रतिष्ठा को जोखिम में डालता है.



बता दें कि सरकार तो एक तरफ हाथ से मैला ढोने पर पाबंदी करने के लिए कानून बनाती है. लेकिन, उस कानून को खुद सरकार ही अमल में नहीं लाती है. यही नहीं रिपोर्ट में जैसा की बताया गया है कि सफाईकर्मियों को अक्सर सामाजिक भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ता है. 



अब सवाल यह है कि इनके साथ सामाजिक भेदभाव और अपमान करने वाले लोग कौन हैं? किस वर्ग से हैं? निश्चित तौर पर इसका जवाब यही है कि केवल उच्च जाति एवं तत्सम जाति के ही लोग हैं. परन्तु, क्या सरकार उनके खिलाफ कोई एक्शन लिया? कुल मिलाकर असल बात ये है कि सरकार ही नहीं चाहती है कि हाथ से मैला ढोने जैसी घिनौनी प्रथा को देश से खत्म किया जाय 

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