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भोपाल गैस कांड : सुप्रीम कोर्ट बोला- पीड़ितों के लिए मुआवज़े पर अपना रुख़ स्पष्ट करे केंद्र सरकार

Published On :    22 Sep 2022   By : MN Staff
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मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के मुआवज़े से जुड़ी एक याचिका पर केंद्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने के लिए कहा है.



नई दिल्ली : मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के मुआवज़े से जुड़ी एक याचिका पर केंद्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने के लिए कहा है. कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या वह भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए अमेरिका में स्थित यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) की उत्तराधिकारी कंपनियों से अतिरिक्त धनराशि के रूप में 7,844 करोड़ रुपये की मांग करने वाली अपनी उपचारात्मक याचिका पर आगे बढ़ना चाहती है. पांच जजों की संविधान पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को केंद्र से निर्देश लेने के लिए कहा. मामले की सुनवाई 11 अक्टूबर को होगी.


पीठ ने कहा, ‘सरकार को अपना रुख तय करना होगा कि वह उपचारात्मक याचिका पर आगे बढ़ेगी या नहीं. पीड़ितों की ओर से पेश अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि अदालत को सरकार के फैसले से परे प्रभावित पक्षों को सुनना चाहिए. लेकिन अदालत ने कहा कि वह क्यूरेटिव पिटीशन के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए केंद्र की प्रतीक्षा करेगी. जस्टिस कौल ने कहा, ‘हम देखेंगे कि क्या आपको बिल्कुल भी सुना जाना आवश्यक है. अगर सरकार क्यूरेटिव पिटीशन परजोर देती है, तो शायद आपका काम आसान हो जाएगा.’


पीड़ितों के वकील ने कहा कि प्रभावित लोगों की संख्या पांच गुना बढ़ गई है और सुनवाई शुरू होनी चाहिए. प्रतिवादी कंपनी की ओर से पेश वकीलों में से एक ने इस पर सहमति व्यक्त की कि मुकदमे को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए. समीक्षा याचिका पर फैसला होने के 19 साल बाद क्यूरेटिव याचिका दायर की गई थी. नंदी ने कहा कि भोपाल गैस त्रासदी जैसे दुर्लभ मामलों में अपवाद होते हैं.


जस्टिस कौल ने वकील से पूछा, ‘जब तक सरकार द्वारा क्यूरेटिव पिटीशन दायर नहीं की गई, तब तक आपको कोई क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने की आवश्यकता नहीं दिखी?’ अपनी क्यूरेटिव पिटीशन में केंद्र ने तर्क दिया है कि 1989 में निर्धारित मुआवजा वास्तविकता से परे था. केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के 4 मई 1989 और उसके बाद 3 अक्टूबर 1991 के आदेशों पर फिर से विचार करने की मांग की थी, जिसमें कहा गया था कि 1989 का समझौता वास्तविकता में सही नहीं था. सरकार ने कंपनी से 7,400 करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त धनराशि मांगी है. अब यूसीसी ने भोपाल गैस त्रासदी मामले में 1989 में निपटान के समय 715 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया था. केंद्र ने मुआवजा राशि बढ़ाने के लिए दिसंबर 2010 में शीर्ष अदालत में सुधारात्मक याचिका दाखिल की थी.


उल्लेखनीय है कि 2 और 3 दिसंबर 1984 की मध्यरात्रि को यूनियन कार्बाइड कारखाने से जहरीली ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ गैस रिसने के बाद 5,000 से अधिक लोग मारे गए थे और लगभग 5.68 लाख लोग प्रभावित हुए थे. इस त्रासदी में जिन लोगों की जान बची वे जहरीली गैस के रिसाव के कारण बीमारियों का शिकार हो गए. वे पर्याप्त मुआवजे और उचित चिकित्सा उपचार के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं.


सात जून 2010 को भोपाल की एक अदालत ने यूनियन कार्बाइड के सात अधिकारियों को दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी. यूसीसी के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन मामले में मुख्य आरोपी थे, लेकिन मुकदमे के लिए उपस्थित नहीं हुए थे. 1992 को भोपाल सीजेएम अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया था. भोपाल की अदालतों ने 1992 और 2009 में दो बार एंडरसन के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था. सितंबर 2014 में उनकी मृत्यु हो गई थी.



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