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मोहन भागवत के हालिया आरक्षण बयान पर राजनीतिक मायने..

Published On :    24 Aug 2019   By : MN Staff
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‘‘केंद्र सरकार मैं बैठी भारतीय जनता पार्टी अगर आरक्षण पर हाथ लगाई तो लालू सबके सामने फांसी लगा लेगा.. फांसी पर लटक जाएगा..’’



लेख: ‘‘आरक्षण के पक्ष और विपक्ष पर सौहार्दपूर्ण बहस होनी चाहिए’’ संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान पर सियासत और खासकर उत्तर भारत की सियासत अचानक से गरम हो चुकी है. हालांकि, मोहन भागवत का यह कोई पहली बार आरक्षण पर दिया गया बयान नहीं है. 


बल्कि, इससे पहले भी वे बिहार विधानसभा चुनाव 2015 से ठीक पहले इसी तरह का बयान दे चुके हैं. उस अपने बयान में भी उन्होंने कहा था कि ‘‘आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए’’ जिसे लेकर आरक्षण के समर्थक नेता इस पर भड़क गए थे. 


हालांकि, बाद में संघ प्रमुख समेत आरएसएस के तमाम पदाधिकारियों ने सफाई भी दी कि उनका मकसद आरक्षण को हटाना बिल्कुल भी नहीं है. लेकिन, फिर भी आरजेडी के मुखिया लालू प्रसाद जी ने तो इसका इतना प्रचार किया कि एक चुनावी रैली में तो उन्होंने यहाँ तक कहा कि 


‘‘केंद्र सरकार मैं बैठी भारतीय जनता पार्टी अगर आरक्षण पर हाथ लगाई तो लालू सबके सामने फांसी लगा लेगा.. फांसी पर लटक जाएगा..’’ इस प्रकार से यह बयान ही पूरे चुनाव का इकलौता मुद्दा बना गया, जिसका आरजेडी एलाइंस को लाभ भी हुआ और बिहार में आरएसएस की अनुषांगिक संगठन बीजेपी चुनाव हार गई.


अब, जब 3 प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने को हैं उससे पहले संघ प्रमुख का इस तरह का बयान आया हो और वह भी तब जब भारतीय जनता पार्टी लगातार बहुमत की भावना को राष्ट्रवाद के नाम पर भड़काकर विस्फोटक निर्णय लेने पर आमादा हो. 


चाहे वह तीन तलाक हो या फिर आर्टिकल 370 को हटाना हो. इससे जरूर आरक्षण एवं सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियों एवं नेताओं को सतर्क हो जाना चाहिए कि यह बहुमत की सरकार अपने बेस वोटर्स को रिझाने के लिए कुछ भी कर सकती है.        


हालांकि, कुछ नेताओं के बयान आने शुरू हो चुके हैं, जिसमें ओमप्रकाश राजभर का नाम पहले लिया जा सकता है. उन्होंने इस बात के लिए संघ प्रमुख को चुनौती भी दिया है. आरजेडी के प्रवक्ता मनोज  समेत कई अन्य लोगों ने भी संघ प्रमुख को आड़े हाथ लिया है. मायावती का भी ट्वीट आया है. 


इसे लेकर, कांग्रेस के भी कई नेता कह चुके हैं कि आरक्षण के मामले में बीजेपी की नीयत ठीक नहीं है.  लेकिन, फिर भी एकजुटता का अभाव देखने को मिल रहा है. काश लालू यादव बाहर होते तो ये हिम्मत नहीं जुटा पाते इस तरह का बयान देने की. लेकिन, शेर को पिंजरे में कैद करके ही यह सब किया जा सकता है. 


यह संघ समेत उनके तमाम नेताओं को भलीभांति मालूम है कहीं लालू यादव बाहर होते तो आज इस बयान को लेकर उत्तर भारत में जरूर कुछ करते. निराश होने की जरूरत नहीं है, बल्कि कुछ करने की जरूरत है. ताकि, यह उत्तर भारत का मैदान फिर से आंदोलित हो सके और इन सांप्रदायिक, आरक्षण विरोधी ताकतों के साथ एससी, एसटी, ओबीसी, किसान, गरीब नौजवान और अल्पसंख्यक लड़ने के लिए तैयार रहें. 


अमित कुमार मंडल
लेखक-लखनऊ विश्वविद्यालय
संपर्क नंबर : 8081874670

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