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उपराष्ट्रपति बोले- सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी एक्ट रद्द कर दिया और संसद में चर्चा भी नहीं हुई, मैं अचंभित हूं

Published On :    4 Dec 2022   By : MN Staff
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सरकार और न्यायपालिका के बीच कॉलेजियम प्रणाली और न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर खींचतान जारी है.



नई दिल्ली :  सरकार और न्यायपालिका के बीच कॉलेजियम प्रणाली और न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर खींचतान जारी है. बीते दिनों केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कॉलेजियम व्यवस्था को अपारदर्शी और एलियन बताया था. अब इस विवाद में उपराष्ट्रपति की एंट्री हो गई है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शुक्रवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को रद्द किए जाने को लेकर संसद में कोई चर्चा नहीं हुई. यह एक बहुत गंभीर मसला है. इसे लेकर मैं हैरान हूं. धनखड़ ने कहा कि संसद द्वारा पारित एक कानून को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया और दुनिया को ऐसे किसी भी कदम के बारे में कोई जानकारी नहीं है. सीजेआई डी. वाई चंद्रचूड़ की उपस्थिति में यहां एल एम सिंघवी स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए धनखड ने यह बात कहीं.


गौरतलब है कि अक्टूबर 2015 में जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाले संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित एनजेएसी अधिनियम, जिसके तहत उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को एक प्रमुख भूमिका दी गई थी. कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बता कर निरस्त कर दिया था.


धनखड़ ने कहा कि संसद द्वारा पारित एक कानून, जो लोगों की इच्छा को दर्शाता है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया और दुनिया को ऐसे किसी भी कदम के बारे में कोई जानकारी नहीं है. सीजेआई चंद्रचूड़ द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के विषय पर बोलने के बाद उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘भारतीय संसद 2015-216 में एक संवैधानिक संशोधन अधिनियम देख रही थी और पूरी लोकसभा ने सर्वसम्मति से मतदान किया. न कोई परहेज था और न ही कोई मतभेद और संशोधन पारित किया गया. राज्यसभा में यह लगभग सर्वसम्मत ही था.


उन्होंने कहा, हम भारत के लोग- उनकी इच्छा को संवैधानिक प्रावधान में बदल दिया गया. जनता की शक्ति, जो एक वैध मंच के माध्यम से व्यक्त की गई थी, उसे खत्म कर दिया गया. दुनिया ऐसे किसी कदम के बारे में नहीं जानती. धनखड़ ने कहा, ‘इतने जीवंत लोकतंत्र में बड़े पैमाने पर लोगों की नियुक्ति करने वाले संवैधानिक प्रावधान को अगर खत्म कर दिया जाए तो क्या होगा? मैं सभी से अपील कर रहा हूं कि ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें दलगत आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए.


उन्होंने कहा, यहा न्यायिक अभिजात्य वर्ग, विचारशील व्यक्ति, बुद्धिजीवी शामिल हैं. मैं उनसे अपील करता हूं कि कृपया दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण खोजें जिसमें किसी संवैधानिक प्रावधान को रद्द किया गया हो.’ संविधान के अनुच्छेद 145 (3), जो एक संवैधानिक मामले का फैसला करने के लिए न्यूनतम पांच-जजों की बेंच स्थापित करने का प्रावधान करता है, का उल्लेख करते हुए धनखड़, जो एक वरिष्ठ वकील भी हैं, ने कहा, ‘जब कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न की बात हो तो संविधान की व्याख्या न्यायालय द्वारा की जा सकती. यह कहीं नहीं कहा गया कि प्रावधान को ख़त्म किया जा सकता है.


यह कहते हुए कि ‘विचार करने में अभी देर नहीं हुई है’ उन्होंने जोड़ा, ‘कानून के एक छात्र के रूप में क्या संसदीय संप्रभुता से कभी समझौता किया जा सकता है? क्या पिछली संसद द्वारा किए गए कार्यों से एक सफल संसद बाध्य हो सकती है?


धनखड़ ने 26 नवंबर को यहां संविधान दिवस के एक कार्यक्रम में इसी तरह की भावना व्यक्त की थी. उन्होंने कहा कि वह हैरान हैं कि इस फैसले (एनजेएसी) के बाद संसद में कोई चर्चा नहीं हुई. इसे इस तरह लिया गया. यह बहुत गंभीर मुद्दा है.’ मालूम हो कि केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू पिछले कुछ समय से न्यायपालिका, सुप्रीम कोर्ट और कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना कर रहे है.

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