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शिकारा हाउसबोट की मरम्मत पर प्रतिबंध के चलते मालिकों के सामने खड़ा हुआ आजीविका का संकट

Published On :    2 Dec 2022   By : MN Staff
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कश्मीर की डल झील पर तैरती मशहूर शिकारा हाउसबोट की मरम्मत करने पर प्रतिबंध लगाए जाने की वजह से हाउसबोट चलाने वाले परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है.



श्रीनगर :  कश्मीर की डल झील पर तैरती मशहूर शिकारा हाउसबोट की मरम्मत करने पर प्रतिबंध लगाए जाने की वजह से हाउसबोट चलाने वाले परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है. हाउसबोट ओनर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता गुलाम कादिर गासी का कहना है कि एक समय एसोसिएशन के साथ 250 हाउसबोट पंजीबद्ध थीं, अब 76 ही बची हैं.


दरअसल 1988 में फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले वाली सरकार ने प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण कश्मीर में नए शिकारा के निर्माण और मौजूदा शिकारा की मरम्मत व नवीनीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया था. सरकार डल झील, निगीन झील और झेलम नदी में इनकी संख्या कम करना चाहती थी. चिनार बाग सहित ये तीन स्थान, हजारों शिकारा का डेरा थे. 2009 में अधिकारियों द्वारा जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट को यह बताने के बाद कि शिकारा,  श्रीनगर के जल प्रदूषण का प्राथमिक स्रोत हैं, प्रतिबंध को फिर से लागू कर दिया गया था. इससे उन लोगों के लिए अपने शिकारे की मरम्मत करना एक कठिन हो गया, जिनका शिकारा अभी चालू है.
वायर के अनुसार, एक शिकारे के मालिक मोहम्मद यूनिस ने कहा कि ‘जब झील और अन्य जल निकायों के आसपास सभी निर्माण प्रतिबंधित थे. अधिकारियों को निर्देश दिया गया था कि वे शिकारा लाइसेंस का नवीनीकरण न करें. इससे अनुमति के बिना मरम्मत करना असंभव हो गया. एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही अनुमति केवल प्राप्त की जा सकती थी, जिसमें सफलता कम ही मिलती है.’ इसके चलते जिनकी आजीविका का एकमात्र साधन शिकारा है, संकट में हैं.


12 नवंबर को झेलम नदी में चलने वाले सुहैल अहमद के शिकारे में दरार पडने से वह पलट गया. उसमें छह पर्यटक मौजूद थे, जिन्हें बचा लिया. उन्होंने कहा ‘हमारा शिकारा झेलम नदी पर सबसे पुराना और लंबा था. इसमें छह बेडरूम थे. हमने पर्यटकों को बचा लिया, लेकिन हमारी आजीविका का एकमात्र स्रोत शिकारा खो दिया. अगले दिन पुलिस ने उसे पानी से निकाल लिया. लेकिन उनके प्रयास व्यर्थ रहे. ‘हमारे पास अब शिकारे को नष्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. हमें सरकार से कोई मुआवजा नहीं मिला. पर्यटन विभाग ने हमे नाव से पानी निकालने के लिए दो वाटर पंप दिए. यह हमारा दूसरा शिकारा है, जो पिछले दो सालों में डूब गया..
हाउसबोट ओनर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता गुलाम कादिर गासी का कहना है कि आजीविका के वैकल्पिक अवसर प्रदान करने में भी प्रशासन की ओर से ध्यान नहीं दिया गया है. उन्होंने कहा कि शिकारा बनाने और मरम्मत करने में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी महंगी हो गई है. रियायती दरों पर इमारती लकड़ी जारी करने के लिए पर्यटन विभाग से किए गए अनुरोधों का कोई परिणाम नहीं निकला. यही कारण है कि शिकारे को आसानी से ठीक करने का कोई तरीका न होने के चलते उनके डूबने का खतरा रहता है.


एक अन्य शिकारा मालिक यूनुस अहमद ने कहा शिकारे का आधार क्षतिग्रस्त होने के चलते पिछले साल कई डल झील और झेलम नदी में डूब गए. ‘शिकारे के आधार में मामूली दरारों की मरम्मत की जा सकती है, लेकिन झेलम नदी में कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां शिकारे को रखा जा सके. सर्दियों के मौसम में कई पर्यटक इनमें रहना पसंद करते हैं. अगर इनमें पर्यटकों की मौत हो जाती है तो कौन जिम्मेदार होगा? कुछ महीने पहले पर्यटन विभाग ने हमें कुछ लकड़ी प्रदान की थी. लेकिन हम अपनी नावों का नवीनीकरण कहां और कैसे करें?’


22 मई 2021 को उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जम्मू कश्मीर में शिकारे के नवीनीकरण की अनुमति देने के लिए एक नई नीति की घोषणा की, जिसने इसके मालिकों को कुछ आशा दी है. हालांकि, अभी तक धरातल पर कुछ भी नहीं हुआ है. अगर किसी को अपने शिकारे का नवीनीकरण करने की अनुमति भी दी जाती है, तो प्रक्रिया में शामिल लंबी और व्यस्त कागजी कार्रवाई में एक साल या उससे अधिक समय लग सकता है.

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