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सुप्रीम कोर्ट में डीएमके का हलफनामा, नागरिकता संशोधन क़ानून को बताया विवादित और मनमाना

Published On :    1 Dec 2022   By : MN Staff
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तमिलनाडु में सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) ने सुप्रीम कोर्ट में 2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को चुनौती दी है.



नई दिल्ली :  तमिलनाडु में सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) ने सुप्रीम कोर्ट में 2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को चुनौती दी है. डीएमके ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सीएए अधिनियम मनमाना है क्योंकि यह केवल पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से संबंधित है. डीएमके ने कहा इस कानून में केवल हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों को शामिल किया गया है. यह स्पष्ट रूप से मुसलमानों को बाहर रखता है और भारत में रह रहे श्रीलंकाई तमिलों को शरणार्थी के रूप में देखता है. यह सही तरीका नहीं है. केंद्र सरकार को हर किसी का ख्याल रखना होगा.

वायर के मुताबिक, हलफनामे में आगे कहा गया, ‘इसके अलावा, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर विचार करते हुए भी यह भारतीय मूल के तमिलों को बाहर रखता है, जो उत्पीड़न के कारण श्रीलंका से भागकर वर्तमान में भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं.’ डीएमके ने आगे कहा, ‘अधिनियम इस वास्तविकता को नजरअंदाज करता है कि कई दशकों से तमिलनाडु में बसे तमिल शरणार्थी गैर-नागरिकता और गैर-देशीकरण के कारण अपने मौलिक अधिकारों और अन्य अधिकारों से वंचित हैं.

हलफनामे में कहा गया है, ‘श्रीलंका के सिंहली बौद्धों ने ऐतिहासिक रूप से तमिलों को आक्रमणकारी माना है, जिन्होंने सिंहली क्षेत्र को लांघा है. श्रीलंकाई संविधान के खंड 9 के अनुसार, श्रीलंका गणराज्य बौद्ध धर्म को सबसे महत्वपूर्ण स्थान देता है और तदनुसार यह राज्य का कर्तव्य होगा कि वह सभी धर्मों के लिए सभी अधिकारों का आश्वासन देते हुए, बुद्ध शासन की रक्षा और पोषण करे.

यह इशारा करते हुए हुए कि सीएए के ‘उद्देश्यों और कारणों’ के अनुसार, ‘पाकिस्तान, अफगानिस्तान और
बांग्लादेश को शामिल करने का आधार यह था कि उनके संविधान में एक विशिष्ट धर्म के लिए प्रावधान किया गया था जिसके कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.’ द्रमुक ने कहा, ‘श्रीलंका में स्थिति बाकी तीन देशों में एक जैसी है. क्योंकि न केवल भारतीय तमिलों ने धार्मिक उत्पीड़न का सामना किया है क्योंकि वे मुख्य रूप से हिंदू थे, उन्होंने ब्रिटिश शासन से सीलोन की स्वतंत्रता के बाद से अपने अल्पसंख्यक दर्जे के कारण बड़े पैमाने पर उत्पीड़न का सामना किया है.

तमिल आबादी के पुनर्वास और प्रत्यावर्तन के लिए भारत और श्रीलंका सरकार के बीच विभिन्न क़रारों की ओर इशारा करते हुए हलफनामे में कहा गया है कि 4 जनवरी, 2010 तक इन पंजीकृत प्रवासियों की कुल संख्या 4,61,631 थी. भारत सरकार द्वारा दायर हलफनामे में तमिल शरणार्थियों की दुर्दशा पर कुछ नहीं कहा गया है.

आगे कहा है कि तमिल शरणार्थियों के प्रति केंद्र के सौतेले व्यवहार ने उन्हें अनिश्चित भविष्य डर में रहने के लिए छोड़ दिया है. स्टेटलेस होने के कारण उन्हें एक समझौता होने के बावजूद सरकारी सेवाओं या निजी क्षेत्रों में रोजगार, संपत्ति, वोट का अधिकार और अन्य लोगों को सरकारी लाभों को लेने से वंचित कर दिया गया है.

गौरतलब है कि विवादित सीएए क़ानून साल 2019 के अंत में संसद के दोनों सदनों से पारित किया था. इसके अगले दिन राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी थी. इसके बाद गृह मंत्रालय ने सीएए को अधिसूचित कर दिया था. लेकिन इसके प्रावधान ही तैयार नहीं किए गए हैं. अब इसके प्रावधान तैयार करने के लिए एक बार फिर से केंद्र सरकार को और समय दिया गया है. यह सातवां विस्तार है. इससे अटकले लगाई जा रही है कि केंद्र सरकार सीएए को लागू करना नहीं चाहती. बल्कि इसके आड़ में केवल मुस्लिमों को ड़राना चाहती है.

बता दें कि इस क़ानून के बनने के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शनों का दौर चला था. इस क़ानून को कुछ सियासी दलों कि नेताओं ने मुस्लिम विरोधी बताया था, लेकिन यह कानून मुस्लिमों के विरोध में नहीं बल्कि एससी, एसटी और ओबीसी के विरोध में है. क्योंकि असम में जारी की गई एनआरसी में कुल 19 लाख लोगों को नागरिकता की सूची से बाहर कर दिया. इसमें 4.5 लाख मुस्लिम है और 14.5 लाख के करीब एससी, एसटी और ओबीसी के लोग है.
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