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अयोध्या से दूर राम मूर्ति के निर्माण के लिए सरकार कर रही जबरन भूमि अधिग्रहण, किसानों का आरोप

Published On :    22 Jan 2022   By : MN Staff
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योगी सरकार द्वारा अयोध्या से 10 किलोमीटर दूर मांझा बरहटा पंचायत में राम की 251 मीटर ऊंची मूर्ति के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहण किया जा रहा है.



नई दिल्ली : योगी सरकार द्वारा अयोध्या से 10 किलोमीटर दूर मांझा बरहटा पंचायत में राम की 251 मीटर ऊंची मूर्ति के निर्माण के लिए ज़मीन अधिग्रहण किया जा रहा है. वहीं ग्रामीणों आरोप है कि सरकार ज़बर्दस्ती उनकी ज़मीनों का अधिग्रहण कर रही है. राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के दो महीने बाद अयोध्या के डीएम ऑफ़िस से निकाले नोटिफ़िकेशन में लिखा था कि राम की मूर्ति बनाने के लिए मांझा बरहटा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले गांवों कि 85.977 हेक्टेयर भूमी सरकार अधिग्रहण करना चाहती है. इस ग्राम पंचायत में लगभग 350 परिवार हैं और आबादी तीन हज़ार के आसपास है.


बीबीसी हिंदी के अनुसार, यहा के एक किसान अरविंद कुमार कहते हैं, इस नोटिफ़िकेशन से सब गांव वाले परेशान हो गए. हम किसान खेती और पशुपालन कर जीवन यापन करते हैं. अगर सरकार हमारी ज़मीन ले लेगी तो हम कहां जाएंगे! हमने संबंधित अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन हमें कहीं से संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा था. उल्टे सरकार और प्रशासन ने ज़मीन अधिग्रहण की सहमति देने के लिए हम लोगों पर दबाव डालना शुरू कर दिया. इसके बाद हमने हाईकोर्ट जाने का फ़ैसला किया.


हाईकोर्ट में हमने अपनी बात रखी कि हम कई पीढ़ियों से मांझा बरहटा में रह रहे हैं. आज़ादी के पहले से ही हम ज़मीनों पर प्रजा की तरह बसे हुए हैं. लेकिन सर्वे बंदोबस्त न होने की वजह से हम गांव वालों की आबादी दर्ज नहीं हो पाई. साल 1992 में महर्षि रामायणविद्यापीठ ट्रस्ट ने मांझा बरहटा की काफी ज़मीन रामायण विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए किसानों से ख़रीदी थी. लेकिन ट्रस्ट ने ना कोई विश्वविद्यालय बनवाया ना ही भूमि पर कभी क़ब्ज़ा किया. 1984 से आज तक न तो ज़मीन का सर्वे बंदोबस्त हुआ है और न ही चकबंदी हुई है. ऐसे में हमें नहीं पता कि हमारी कौन सी ज़मीन ट्रस्ट के पास है.


हाईकोर्ट ने किसानों की सुनते हुए ऑर्डर पास कर प्रशासन को भूमि का सर्वे बंदोबस्त कराने और भूमि अधिग्रहण क़ानून (2013) के तहत किसानों की ज़मीनों का अधिग्रहण करने का निर्देश दिया. अरविंद कहते हैं कि साल भर बीत जाने के बाद भी ना तो प्रशासन ने किसानों की सहमति ली न मुआवज़े पर बात बनी और न ही सर्वे कराया गया. बल्कि गाव वालों को प्रशासन ने टॉर्चर करना शुरू कर दिया और 15 नामज़द और 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया.


इसी गांव के राम अवध यादव कहते हैं कि महर्षि महेश योगी के ट्रस्ट को गांव वालों ने ज़मीन स्कूल बनवाने के लिए बेची थी क्योंकि गांव के आसपास कोई स्कूल नहीं था. सब चाहते थे कि उनके बच्चे स्कूल में पढ़ें और आगे बढ़ें, लेकिन 30 साल बीत जाने के बाद भी गांव में स्कूल नहीं खोला गया. उन्होंने कहा, प्रशासन ने हमें परेशान कर रखा है. मेरी पत्नी इस गांव की प्रधान हैं. मुझे बीडीओ या सेक्रेटरी के माध्यम से डीएम कार्यालय ले जाकर कहा जाता कि गांव वालों से ज़मीन की सहमति दिलाओ. मजबूरी में मुझे अपनी सहमति देनी पड़ी. दबाव डालकर सहमति ली जा रही है.


इस मामले पर हाईकोर्ट में किसानों का पक्ष रख रहे अधिवक्ता ओंकार नाथ तिवारी ने कहा कि वास्तविकता ये है कि प्रशासन गांव वालों को तरह-तरह से टॉर्चर कर सहमति ले रहा है. होमगार्ड को बर्खास्तगी का ऑर्डर दिखा कर कह दिया कि आप कल से काम पर नहीं जाएंगे आप बर्खास्त हो गए हैं. अब जिसको अपने परिवार को पालना है वो तुरंत कहता है कि सरकार हमारी ज़मीन ले लो. चपरासी को निलंबित कराने की धमकी दी जा रही है. लेखपाल को अधिकारी से धमकी, कोटेदार को सस्पेंड कर दे रहे हैं और बैनामा करने का दबाव बना रहे हैं. अब जिसको नौकरी करके बच्चों को पालना है वो मजबूरन अपनी सहमति दे रहा है. सरकार के अधिकारी डंडे मारकर सहमति ले रहे हैं.


सरकार 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत किसानों की ज़मीन लेने में आनाकानी कर रही है क्योंकि 2013 अधिग्रहण क़ानून के तहत भू-स्वामियों को मुआवज़ा देना सरकार को महंगा पड़ रहा है इसलिए सरकार और प्रशासन कह रहा है कि किसान सहमति से अपनी ज़मीन दे रहे हैं. गांव के लोग जीविकोपार्जन के लिए खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. ऐसे में उनकी चिंता है कि अगर वे अपनी ज़मीनें दे देते हैं तो बदले में सरकार उनका भविष्य कैसे सुरक्षित करेगी? ज़मीन के बदले ज़मीन देगी या किसी सदस्य को नौकरी देगी? इस पर सरकार या प्रशासन की तरफ़ से कोई लिखित आश्वासन नहीं मिलने से भी गांव वाले चिंतित हैं.
 

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