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सूरत में सीवर की सफाई के दौरान दो सफाईकर्मियों की मौत, कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की उड़ रही धज्जियां

Published On :    20 Jan 2022   By : MN Staff
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कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के धज्जियों उडाते हुए बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर की सफाई आज भी लगातार जारी है. जिसके चलते सीवर सफाई कर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है.



सूरत : कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के धज्जियों उडाते हुए बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर की सफाई आज भी लगातार जारी है. जिसके चलते सीवर सफाई कर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है. ऐसा ही एक मामला गुजरात से सामने आया है. सूरत जिले के चलथाण क्षेत्र स्थित एक इमारत के सीवर की सफाई के दौरान जहरीली गैस से दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई. दोनों आपस में रिश्तेदार थे. पुलिस ने मंगलवार को यह जानकारी दी.


पुलिस ने मृतकों की पहचान प्रमोद तेजी और उसके रिश्तेदार विशाल पोल के रूप में की है, जो राजस्थान के मूल निवासी थे और वर्तमान में सूरत शहर के पास पलसाणा में रह रहे थे. सूरत ग्रामीण के कडोदरा-जीआईडीसी थाने के पुलिस उपनिरीक्षक एस एम पटेल ने बताया कि सोमवार को भूमिगत सीवर लाइन की सफाई के लिए चलथाण में एक आवासीय भवन के प्रबंधन ने दोनों को काम पर रखा था.


पटेल ने कहा, शाम को सीवर में प्रवेश करने के कुछ मिनट बाद, जहरीली गैस के कारण दोनों बेहोश हो गए. घटना के बारे में जानने पर, स्थानीय लोगों ने किसी तरह उन्हें बाहर निकाला और एम्बुलेंस बुलाई. उन्हें पास के अस्पताल ले जाया गया, लेकिन चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अधिकारी ने बताया कि पुलिस ने दुर्घटनावश मौत का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.


बता दें कि प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एंड देअर रिहैबिलिटेशन एक्ट-2013 सीवर और नाले की सफाई मैनुअल स्कैवेंजिंग के लिए सफाई कर्मियों को काम करने से रोकता है. वर्ष 2019 में गुजरात सरकार ने एक याचिका प्रतिक्रिया में गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष कहा था कि राज्य के नगर निकायों को निर्देश दिया गया है कि सीवर की सफाई के लिए मैनहोल में किसी व्यक्ति जाने के लिए न कहा जाए. वर्ष 1993 में देश में पहली बार मैला ढोने की प्रथा पर बैन लगाया गया था. 


इसके बाद वर्ष 2013 में कानून बनाकर इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन देश में आज भी मैला ढोने की प्रथा जारी है. इस कानून में प्रावधान था कि यदि कोई सफाई कर्मी आपात स्थिति में सीवर के अंदर जाता है तो उसे पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध हो. इस कानून के तहत सफाई कर्मियों को आर्थिक सहायता देने का भी प्रावधान है.


वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 2013 का कानून पूरी तरह से लागू करने का आदेश दिया था. साथ ही यह भी आदेश दिया था कि सीवर और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोका जाए और 1993 के बाद सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मरने वालों के आश्रितों को दस लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए.


वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग और सीवर सफाई के दौरान हो रही लोगों की मौत पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि दुनिया में कहीं नहीं लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर में भेजा जाता है. इस प्रथा पर सख्त टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि आजादी के 70 वर्षों से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी देश में जातिगत भेदभाव कायम है.


पिछले साल केंद्र सरकार ने आरजेडी सांसद मनोज झा के एक सवाल के जवाब में संसद को बताया था कि मैला ढोने के काम में 58,098 लोग लगे हुए हैं. इनमें से 43,797 लोगों जाति से संबंधित आंकड़े हैं जिसमें से 42,594 लोग अनुसूचित जाति के ह.ैं अर्थात 97 प्रतिशत के करीब मैनुअल स्कैवेंजर अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं. इसके अलावा 421 अनु. जनजातियों के हैं जबकि 431 अन्य पिछड़े वर्गों और 351 अन्य वर्गों से हैं. अगस्त 2021 में केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि राज्य सरकारों द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 941 सफाईकर्मियों की मौत हुई. हालांकि यह सरकारी आंकड़े है, वास्तवक आंकडे इससे ज्यादा हो सकते है.
 

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