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एमएन टीवी पर दिल्ली दंगा को लेकर एक और खुलासा

Published On :    6 Mar 2021   By : MN Staff
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दिल्ली दंगा में दंगाईयों का साथ दे रही थी दिल्ली पुलिस : कुमार काले



पुणे : दिल्ली दंगा में दिल्ली की पुलिस दंगाईयों का साथ दे रही थी. इसलिए दंगाईयों द्वारा नारा लगाया जा रहा था कि ‘‘ये अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है’’. पुलिस के सामने दंगे हो रहे थे. उस समय कई सारे वीडियो वायरल हुए थे कि पुलिस दंगा भड़काने वाले लोगों के साथ में खड़ी है, दंगाईयों का मदद करने का काम कर रही है. पुलिस ड्यूटी कर रहे थे मगर किसी के भी कंधों पर कोई बैच नहीं था, सभी के साभी हेलमेट डालकर खड़े थे ताकि उनकी पहचान ना हो सके. यह बात एमएन टीवी के मुख्य संपादक कुमार काले ने ‘‘थॉट कास्ट’’ के 8वें एपिसोड में कही.


कुमार काले ने कहा, एनआरसी, सीएए को लेकर देशभर और खासकर दिल्ली में बहुत बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे थे. शाहीन बाग का आंदोलन हो, जामिया यूनिवर्सिटी का आंदोलन हो या दिल्ली और देशभर में अलग-अलग जगहों पर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन चल रहे  थे. किसी भी तरीके से कोई हिंसा वहां पर नहीं हो हुई. लेकिन, फरवरी महीने में सीएए के समर्थन में सरकार द्वारा प्रायोजित जो आंदोलन किए गए. खासकर दिल्ली में सीएए के समर्थन में जो प्रदर्शन किए गए उन प्रदर्शनों में बहुत बड़े पैमाने हिंसा हुई. 


इन प्रदर्शनों से पहले दिल्ली में बीजेपी नेता या संघ परिवार से जुड़ी हुई संस्था के लोगों द्वारा भड़काऊ भाषण भी हुए. कपिल मिश्रा का लगातार हिंसा भड़काने वाला भाषण सोशल मीडिया में काफी वायरल हुआ और वह पुलिस के पास भी रिकॉर्ड थे. इसी तरह से अनुराग ठाकुर यानी सेंट्रल गवर्नमेंट के स्टेट मिनिस्टर भी लोग भड़काऊ भाषण कर रहे थे. उन भाषणें के बाद सीएए के समर्थन में जो आंदोलन हो रहे थे उस में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. चार दिन तक दिल्ली में हिंसा चलती रही. ये इतनी बड़ी हिंसा थी कि इसमें 53 लोग मारे गए. हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा और निशाना बनाकर मुसलमानों की प्रॉपर्टी जलाई गई, उनके घर जलाए गए, उनके ऊपर हमले किए गए.  


उन्होंने कहा, मरने वालों 53 में से 38 मुसलमान थे. इससे पता चलता है कि निशाना किसके ऊपर बनाया गया था. इतना ही नहीं, पुलिस ने बाद में जो चार्ज सीट बनाने के बाद जिन लड़कों को गिरफ्तार किया गया उसमें भी बड़े पैमाने पर मुस्लिमों को ही पकड़ा गया. यही नहीं,  पुलिस ने जामिया इंस्टिट्यूट, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में जाकर किस तरीके से वहां पर हमले किए थे ये भी एक सबूत है. इस तरह से पुलिस की भूमिका को लेकर बहुत बड़े पैमाने पर सवाल खड़े हुए. 



Role of Indian Police in Suppressing Movements and Spreading Riots


असल में दिल्ली में होने वाले चुनाव को ध्यान में रखकर भड़काउ भाषण किया गया और फसाद करवाया गया था ताकि चुनाव में इसका फायदा बीजेपी को मिल सके. यह बात अमित शाह के द्वारा भी खुलकर कही गई. चूंकि, दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के नियंत्रण में आती है. इसलिए दंगों को कंट्रोल करने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की थी. परन्तु, दिल्ली पुलिस की जो भूमिका होनी चाहिए थी वो नहीं थी. क्योंकि, 410 से ज्यादा एफाआईआर मुस्लिमों के द्वारा किए गए. वहीं 190 एफआईआर हिन्दुओं के द्वारा दायर किए गए थे. मगर सबसे ज्यादा मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया.

दंगे में पुलिस की भूमिका
उन्होंने आगे कहा, उस समय पुलिस के सामने दंगे हो रहे थे. उस समय कई सारे वीडियो वायरल हुए थे कि पुलिस दंगा भड़काने वाले लोगों के साथ में खड़ी है, उनके मदद करने का काम कर रही है. पुलिस ड्यूटी कर रहे थे मगर किसी के भी कंधों पर कोई बैच नहीं था, सभी के साभी हेलमेट डालकर खड़े थे ताकि उनकी पहचान ना हो सके. 


कुछ वीडियो ऐसे भी देखने को मिले जिसमें दंगाई बड़े पैमाने पर नारा लगा रहे थे कि ‘‘अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है’’. यानी दंगा करने वालों को पुलिस प्रोटेक्शन दे रही थी और दंगाई खुलकर दंगा कर रहे थे और जो मुसलमान दंगा रोकने का काम कर रहे थे उनके ऊपर पुलिस लाठीचार्ज करने का काम कर रही थी. ऐसे भी वीडियों देखने को मिले. जब मामला दिल्ली हाई कोर्ट में गया तो दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल गवर्नमेंट को फटकार लगाई. क्योकि उनकी तरह से जो सबूत रखे गए वो किसी भी तरह से मान्य नहीं थे.


पुलिस व्यस्था पर पूछे गए सवाल के जवाब में कुमार काले ने कहा, पुलिस शब्द भारतीय नहीं है. क्योंकि, अंग्रेजों से पहले भारत में पुलिस नाम की कोई व्यवस्था नहीं थी. क्योंकि, राजाओं, महाराजाओं के फौज थी. लेकिन, भारत में अंग्रेजों के आने के बाद अंग्रेजों ने भारत में पुलिस व्यवस्था बनाई. उन्होंने कहा, भारत में 1857 के अंग्रेजों विरूद्ध गदर के बाद 1860 में इंडियन पिनल कोड बनाया गया और 1861 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया. 


इसी एक्ट के तहत भारत में पुलिस व्यवस्था बनाई गई. इस व्यवस्था को बनाते समय अंग्रेजों ने अपने उद्ेश्य को ध्यान में रखते हुए बनाया. क्योंकि, अंग्रेज भारत में राज करना चाहते थे, इसलिए उनके खिलाफ कोई बगावत न करे, उनकी सरकार के खिलाफ कोई बगावत न करे इसलिए उनके खिलाफ होने वाले बगावत को नियंत्रित करनके लिए उन्होंने पुलिस व्यवस्था लागू की. इस व्यवस्था को बनाते समय अंग्रेजों ने कुछ विशेषताएं भी रखी. लगभग 150 देशों में अंग्रेजों का राज था. वहां की भौलोगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उन्होंने पुलिस व्यवस्था बनाई.


आगे कहा कि जब अंग्रेजों ने भारत में पुलिस व्यवस्था बनाई तो यहां की धार्मिक और समाजिक व्यवस्था को देखा और उसके आधार पर पुलिस व्यवस्था खड़ी की. इस कानून बनने से पहले भारत में अंग्रेज तकरीबन सौ साल पहले रह चुके थे. इसलिए उनको यहां की धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्था का अनुभव हो चुका था. उन्होंने बारीकी से देखा था कि यहां की जो धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था वह वर्ण और जाति के आधार पर खड़ी है, ऊंच-नीच पर खड़ी है. उन्होंने यह भी देखा कि केवल चंद मुट्ठीभर लोग धर्म के आधार पर यहां के 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को नियंत्रित करके शासक बना हुआ है. चूंकि, यहां पर असमानता, क्रमिक असमानता, ऊंच-नीच, भेदभाव पर आधारित व्यवस्था ही और यहां पर मनुस्मृति का राज था. जो दुनिया की सबसे घटिया गुलामी है वह भारत में है. इन सभी व्यवस्था को देखते हुए अंग्रेजों ने भारत में पुलिस व्यवस्था बनाई.


कुमार काले ने कहा, जिस व्यवस्था में गैरबराबरी हो, ऊंच-नीच हो उस व्यवस्था में मानव अधिकारों, समानता पर काम करने वाली पुलिस व्यवस्था कैसे काम कर सकती है? इसलिए अंग्रेजों से समय से लेकर आज तक यहां की पुलिस न तो समानता को मानती है और न ही अधिकारों को मानती है. क्योंकि, जिस व्यवस्था में जिस तरह से मानव अधिकारों का हनन किया ठीक वहीं व्यवस्था उन्होंने यहां भी लागू कर दी. यही कारण है कि आम आदमी भी पुलिस से डरती है. चूंकि, बड़े अधिकारी तो छोड़िए मामूली कांस्टेबल भी सम्मान के साथ बात नहीं करता है. बल्कि आम आदमी को शक की निगाहों से देखा जा रहा है और उन्हीं के ऊपर डंडे चलाए जा रहे हैं. यहां की साधारण जनता कोर्ट और थानों में जाने से डरती है.
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