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स्वतंत्र मीडिया को बेअसर करने की मंत्रियों की मंत्रणा के बाद बनाए गए नए डिजिटल मीडिया नियम

Published On :    5 Mar 2021   By : MN Staff
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मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए सोशल मीडिया का गला घोंटने का कानून बना रही : द कारवां पत्रिका



नई दिल्ली : मीडिया में सरकार की छवि को चमकाने और स्वतंत्र पत्रकारिता का दमन करने के लिए मोदी सरकार के मंत्रियों के समूह (जीओएम) की एक रिपोर्ट का खुलासा हुआ है. इसमें सत्ता के पक्ष में बोलने वाली मीडिया, जिसे आमतौर पर गोदी मीडिया कहा जाता है, को बढ़ावा देने और सरकार को जवाबदेह ठहराने वाले पत्रकारों को निशाना बनाने जैसी तमाम योजनाबद्ध रणनीति का वर्णन किया गया है.


द कारवां पत्रिका द्वारा प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने ऐसे लोगों को खामोश करने की योजना बनाई है जो सरकार के खिलाफ खबरें लिख रहे हैं या जो सरकार के एजेंडा को फॉलो नहीं कर रहे हैं. पत्रिका ने कहा, जीओएम की रिपोर्ट में अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा जाहिर की गई एक चिंता पर ज्यादा जोर दिया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार के खिलाफ लिखने वाले या फेक नैरेटिव चलाने वालों को चुप कराने के लिए हमारे पास एक स्ट्रैटजी होनी चाहिए. खास बात ये है कि हाल ही में लाए गए विवादित डिजिटल मीडिया नियमों को स्पष्ट रूप से इन बातों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. नियमों की चौतरफा आलोचना हो रही है.


‘सरकारी संचार पर मंत्रियों के समूह’ नामक इस रिपोर्ट को पिछले साल जून और जुलाई महीने के दौरान हुई कुल छह बैठकों के बाद तैयार किया गया है. जीओएम में नकवी के अलावा कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद, महिला एवं बाल विकास तथा इस्पात मंत्री स्मृति ईरानी, सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल थे. इसके अलावा राज्यमंत्रियों में से किरन रिजिजू, हरदीप सिंह पुरी, अनुराग ठाकुर और बाबुल सुप्रियो भी इसके सदस्य थे. मंत्रियों ने सरकारी विभागों के बीच मंथन करने के अलावा सरकार की तरफदारी करने वाले पत्रकारों से भी संपर्क साधा और मीडिया में सरकार की छवि सुधारने के लिए सलाह मांगी. इसमें कई चौंकाने वाले सुझाव शामिल हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजील डोभाल के करीबी नितिन गोखले ने कहा कि हमें पत्रकारों पर उनके काम के हिसाब से ‘ठप्पा’ लगाने का काम करना चाहिए. इसका मतलब है कि पत्रकारों को ‘सरकार के पक्ष’, ‘तटस्थ’ और ‘सरकार विरोधी’ श्रेणियों में बांटा जाना चाहिए. वहीं प्रसार भारती के प्रमुख सूर्य प्रकाश ने कहा कि सरकार को ‘अपनी असीमित शक्तियों’ का इस्तेमाल कर इन पत्रकारों को ‘नियंत्रित’ करना चाहिए. 



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इसके साथ ही आरएसएस विचारक एस. गुरुमूर्ति ने कहा कि सरकार को ‘पोखरण इफेक्ट’ (संभवतः इसका मतलब सर्जिकल स्ट्राइक या पोखरण परमाणु परीक्षण से है) जैसा माहौल तैयार करना चाहिए और इस बीच नीतीश कुमार और नवीन पटनायक जैसे व्यक्तियों द्वारा मोदी सरकार के पक्ष में बयान दिलवाना चाहिए. खास बात ये है कि गुरुमूर्ति ने कहा कि वैसे तो रिपब्लिक चैनल सरकार के पक्ष में खबरें प्रकाशित कर रहा है लेकिन ‘इसे खारिज किया जाता रहा है. इसलिए हमें पोखरण जैसी नैरेटिव बनाने की जरूरत है.

इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने ऐसे 50 लोगों की सूची बनाकर उन पर निगरानी रखने की सलाह दी, जो लगातार सरकार के विरोध में बोलते हैं. इसके साथ ही उन्होंने 50 ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करने और उनके साथ मिलकर काम करने को कहा जो सत्ताधारियों के साथ में हैं. वहीं नकवी और रिजिजू ने भी करीब-करीब ऐसा ही सुझाव दिया और कहा कि सरकार की तरफदारी करने वाले संपादकों, स्तंभकारों, पत्रकारों, कमेंटेटर्स का समूह बनाया जाए और लागातार उनके साथ मिलकर काम किया जाए. रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ‘कुछ नामी शिक्षाविदों, कुलपतियों, रिटायर्ड आईएफएस अधिकारियों इत्यादि द्वारा सरकार की उपलब्धियों और विचारों पर लेख लिखवाए जाने चाहिए.



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मंत्रियों के समूह की इस रिपोर्ट में एक बेहद चिंताजनक बात निकलकर सामने आई है कि किस तरह मोदी सरकार, इसके पैरोकार और गोदी मीडिया के पत्रकार कुछ चुनिंदा डिजिटल मीडिया का गला घोंटने की तैयारी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि ऐसा करने के लिए उन्हें सुनियोजित तरीके से कदम उठाने की जरूरत है, ताकि ऐसे लोगों को नियंत्रित किया जा सके. हालांकि, अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि जीओएम द्वारा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को दिए गए निर्देशों को लागू कर दिया गया है या नहीं. लेकिन, ये पूरी तरह स्पष्ट है कि मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए सोशल मीडिया सहित कुछ चुनिंदा मीडिया की गला घोंटने का कानून बना रही है.
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