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पूंजीवादियों को किसानों का खुलेआम शोषण करने की छूट देने के लिए लाए कृषि कानून

Published On :    3 Mar 2021   By : MN Staff
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कुमार काले का मोदी सरकार पर हमला



पुणे : एमएन टीवी के मुख्य संपादक कुमार काले ने नए कृषि कानून को लेकर केंद्र की मोदी सरकार हमला बोला है. उन्होंने कहा की केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून में संशोधन करने के नाम पर किसानों पर पूंजीवाद थोपने और पूंजीवादियों को किसानों का खुलेआम शोषण करने की छूट देने के अधिकार के लिए नए तीन कृषि कानून लाए गये. कुमार काले ने यह बात एमएन टीवी की ओर से शुरू किए गए थॉट कॉस्ट के प्रथम एपीसोड में भूमी अधिग्रहन कानून और केंद्र की ओर से लाए गये नए तीन कृषि काननू का किसानों द्वारा किए जा रहे विरोध के चलते कही.


कुमार काले ने कहा, जो मोदी सरकार द्वारा कृषि कानून में संशोधन करने के नाम पर किसानों पर पूंजीवाद थोपने का और पूंजीवादियों को किसानों का खुलेआम शोषण करने का छूट देने के अधिकार के लिए नए तीन कृषि कानून लाए गये. उन्होंने कहा, पिछले साल 20 नवंबर से किसान नए कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे है. इसके बावजूद सरकार इसका समाधान निकालने की स्थिती के मूड में नहीं हैं.


सरकार कह रही है की कृषि कानून के मुद्दे पर हम किसानों के साथ वार्ता कर रहे है. सरकार और किसान संगठनों के बिच 11 दौर की वार्ता हुई, इसमें किसानों को सुना गया, लेकिन किसानों की बातों को नहीं माना जा रहा है. पीएम मोदी अपनी ही बात मनवाने के लिए यह सब कर रहे हैं.


उन्होंने कहा, लगभग 80 दिनों से किसान आंदोलन कर रहे है और यह आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा हैं. इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने के लिए किसानों को इसमें ओर मुद्दे शामिल करने की जरूरत हैं. उन्होंने कहा, कामगार कानून में भी संशोधन किए गये. किसान अगर अपनी शक्ति मे मजदूरों को भी साथ जोड़ ले और आंदोलन करे तो आंदोलन की व्याप्ति और भी बढ़ सकती है. क्योंकि किसानों की तरह मजदूर भी कारखाने में काम करते हैं. 


उनकी भी बडी समस्या है. 40 ऐसे लेबर कोड है जिन्हें संशोधन के नाम कर खत्म कर दिया गया है. किसानों को अपने आंदोलन की व्याप्ति बढ़ाने के लिए मजदूरों के मुद्दे भी उठाने की जरूरत है. अगर किसान और मजदूर की शक्ति को इकठठा किया जाए तो देश में बहोत बड़ी अस्थिरता पैदा हो सकती है.


उन्होंने कहा, कामगार संगठनों को किसानों से पहले सड़क उतरने की जरूरत थी. क्योंकि किसानों से ज्यादा मजदूर इस देश में संगठित है, ऐसा दावा मजदूर संगठन करते है. और देश में शेकडों सालों से जो ट्रेड यूनियन काम कर रहे है, लेकिन उन्हें भी यह मुनासिब नहीं समजा. जब देश में लॉकडाउन के दौरान मजदूरों के हाल हुए तब भी मजदूर संगठनों ने ना आवाज उठाई ना आंदोलन किया ना मजदूरों के समर्थन में ट्रेड यूनियनों ने बात कही. क्योंकि भारत में मजदूर संगठन चलाने वाले लोग मजदूर नहीं है. 



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शोषितों के विरोध में काम करने वाला एक वर्ग हैं, जो मजदूर संगठन चलाते हैं उसका नेतृत्व करते हैं. यह मजदूर संगठन प्रस्थापित राजनितिक दलों की ओर से चलाये जाते है. अधिकांश राजनितिक दलों के मजदूर संगठन है. उनके प्रतिनिधी संसद में भी होते हैं, लेकिन वह इस मुद्दों को संसद मे नहीं उठाते. मजदूर संगठनों की खामोशी लेबर लॉ की समर्थन की बात साबित करती है.


कुमार काले ने कहा, इस देश में मजदूर और किसानों को इकठ्ठा करने की कोशिश फुले, शाहू, आंबेडकरी आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर की गई. राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने सबसे पहले किसानों का दुष्मन कौन है, इसकी पहचान कराई थी. उन्होंने कहा था की पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद यह किसानों और मजदूरों के नंबर एक के श़त्रू हैं. ज्योतिराव फुले ने पूंजीवाद से पलहे शेटजी को पहले नंबर पर लिया था. क्योंकि यही लोग किसानों और मजदूरों का सबसे ज्यादा शोषण करते हैं. 


शाहू महाराज ने भी यही बात की थी. बाबासाहाब अंबेडकर ने तो लेबर पार्टी बनाई थी. बाबासाहाब को राजनीति में सबसे ज्यादा सफलता लेबर पार्टी के रूप में ही मिली थी. बाबासाहाब ने किसानों और मजदूरों का सबसे बड़ा संगठन भी बनाया था और वह इस दिशा में आगे भी बढ़ रहे थे. आजादी के पहले कांग्रेस का दल इस पर काम करता रहा. कम्यूनिस्टों भी पूंजीवाद के विरोध में एक विचारधारा खड़ी की, ऐसा नकली दावा वे करते रहे. 


असल में वह कांग्रेस से ही निकले हुए लोग थे जो पूंजीवाद का विरोध नहीं बल्कि समर्थन करते थे. जो कम्यूनिजम को चला रहे थे. पूंजीवाद का उनका अलग नारा था. कुमार काले ने कहा, भारत में जाति को अलग रखकर कोई वर्ग नहीं बना सकते. इस देश में किसान और मजदूरों की एक लड़ाई लड़ने का काम केवल बहुजन विचारधारा के आधार पर किया जा सकता है. इसके लिए समाज में बड़े पैमाने पर पहल हो रही है.



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कुमार काले ने कहा, जब से भारत में नई आर्थिक नीति अपनाई गई है इस नीति के पहिले नंबर के शिकार भारत में किसान बने हैं. देश में विकास का कोई भी काम करना हो या विकास की कोई परियोजनाएं बनाना हो तो इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरत जमीन की होती है. आज यह जमीन किसान और आदिवासियों के पास है. हालांकि इस देश में बड़ी संख्या में एससी के लोग भूमिहीन है. लेकिन विकास के नाम पर किसानों और आदिवासियों का सबसे ज्यादा शोषण किया गया है. बड़े-बड़े डैम बनाने के लिए आदिवासियों की जमीन ली गई और उन्हें जंगलों से खदेड दिया गया.


इसके अलावा मायनिंग के लिए भी आदिवासियों को जंगल जमीन से बेदखल करने का काम होता रहा. जब से नई आर्थिक नीति अपनाई गई और विकास की परियोजनाएं बनाने के लिए जमीन की जरूरत थी. किसानों से यह जमीन लेना आसान काम नहीं था. क्योंकि किसान आसानी से अपनी जमीन सरकार को देना नहीं चाहते थे. इसलिए किसानों की जमीन छिनने के लिए सरकार समय समय पर भूमी अधिग्रहन कानून में बदलाव करती रहीं. यह बदलाव कॉरपोरेट के हित को ध्यान में रखते हुए किए जा रहे हैं.


उन्होंने कहा, अंग्रेजोंने भूमी अधिग्रहन कानून बना कर पब्लिक इंटरेस्ट को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जमीन लेना शुरू किया था. अंग्रेजो ने हजारों लोगों से स्कूल, कॉलेज, रेल, और अन्य परियोजनाओं के लिए जमीन ली. इसका देश के करोड़ों लोगों को फायदा हुआ. अब सरकार ने इस इसकी नीति में बदलाव किया की अब पब्लिक इंटरेस्ट के लिए नहीं बल्कि कॉरपोरेट इंटरेस्ट के लिए जमीन ली जाएगी. इसका परिणाम यह होगा की इसका फायदा अब किसान, मजदूर या आम जनता को नहीं बल्कि कॉरपोरेट को ही होगा. हजारों किसानों की जमीन लेकर सिर्फ अंबानी अदानी के फायदेवाली बात होगी. इसलिए सारे कानूनों में बदलाव हो रहे है.



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कुमार काले ने कहा, पिछले 30 सालों से समय-समय पर भूमी अधिग्रहण कानून में संशोधन किए जाते रहे. लेकिन पिछले 10 सालों में देश के दस से 11 राज्यों ने अपने भूमी अधिग्रहन कानून में बदलाव किये. उन्होंने यह बदलाव पूंजीपतियों को ध्यान में रखकर किए है. इसके पहले जमीन खरिदेने वालों को किसान होना जरूरी था. किसान ही जमीन खरीद सकता था और खरीदी हुई जमीन का इस्तेमाल खेती के शिवाय अन्य कामों के लिए नहीं कर सकता था. 


उन्होंने याद दिलाया की अमिताभ बच्चन को भी जमीन खरीदने के लिए किसान होना पड़ा था. लेकिन कई लोगों ने नकली किसान बन कर किसानों की हजारों एकड़ जमीन ली है. अब जो किसान ही किसानों की जमीन खरीद सकता था, इस नियम को कई राज्यों ने हटाया है. अब इंडस्ट्री के नाम पर कोई भी व्यक्ति किसानों से जमीन खरीद सकता हैं और इस जमीन का वे खेती अलावा अन्य कामों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. यह बदलाव सरकार के द्वारा भूमी अधिग्रहन कानून में किये गए. लगभग 11 राज्यों ने यह बदलाव किए. इसमें पांच बड़े राज्यों में भाजपा की सत्ता हैं. इन राज्यों में किसानों की जमीन छिनने का काम बड़े पैमाने पर हो रहा है. इन राज्यों में पहाडों की जमीन पूंंजीपतियों को दी जा रही है.


उन्होंने कहा महाराष्ट्र और राजस्थान में भी भूमी अधिग्रहन कानून में बदलाव किये गए. यह बदलाव फरवरी 2020 में भाजपा के शासनकाल में किए गये. उन्होंने खास बात बताई की राजकिय दलों के रूल बदलते है, लेकिन उनकी पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं किया जाता. उन्होंने आंध्र प्रदेश या तामिलनाडू का उदाहरण देकर कहा की वहां एक अलग विचारधारा रखने वाले दल सत्ता में है, लेकिन वहां भी भूमी अधिग्रहन कानून में बदलाव किये गए. यानी वहा सत्ताधारी लोग पब्लिक इंटरेस्ट से ज्यादा कॉरपोरेट पॉलिसी को फॉलो कर रहे हैं. क्योंकि इन पार्टियों को भी चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए, जो पूंजिपतियों द्वारा उन्हें दिया जा रहा है.


कुमार काले ने कहा, नई इकनॉमि पॉलिसी में पहले नंबर पर स्पेशल इकनॉमिक झोन यानी सेज था. इसके तहत सरकार ने उद्यमियों को काफी सारी सवलते दी थी. केंद्र ने राज्य सरकारों के साथ मिल कर शेकडों सेज के प्रोजेक्ट शुरू किए थे. सन 2015 तक 45 हजार हेक्टर से भी ज्यादा जमीन नोटिफाय कर 28 हजार हेक्टर जमीन ही उद्योंगों को दी गई. लेकिन जहां पर यह सेज शुरू किए गये थे वहां की जमीन पर सेज वर्किंग स्थिती में नहीं हैं. कुमार काले ने बताया की ओडीशा के गोपालपुर में 1995 में टीस्को के प्रोजेक्ट के लिए लगभग 3799 एकर जमीन दी गई थी. इस जमीन पर कोई इंडस्ट्री खडी नहीं कि गई. वह जमीन खाली पड़ी हुई हैं. 


इसके अलावा अलग- अलग राज्यों में भी सेज के लिए जो जमीन ली गई उसका भी इस्तेमाल नहीं किया गया. बंगाल में ली गई जमीन में से महज साडेतीन फीसदी जमीन का इस्तेमाल किया गया और बाकी जमीन वैसे ही पडी हुई है. ऐसा ही हाल ओडीशा का भी है. यहा पर 96.58 फीसदी जमीन खाली पडी हैं. इसी तरह महाराष्ट्र में भी 70 फीसदी जमीन और कर्नाटक में 57 फीसदी, तामिलनाडू में 49 फीसदी, आंध्र में 47 और गुजरात में 48 फीसदी जमीन खाली पडी हुई है. यानी एक तरह किसानों से विकास के नाम पर जमीन ली गई, उनकी किसानी बंद कर दी गई और उस जमीन का इंडस्ट्री के लिए कोई इस्तेमाल नहीं किया गया.

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