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बामसेफ एवं राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ का 34वाँ संयुक्त गुजरात राज्य अधिवेशन

Published On :    8 Aug 2020   By : MN Staff
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हम हर स्थिति, परिस्थिति में आंदोलन को लगातार जारी रखना चाहते हैं : वामन मेश्राम



पुणे : लॉकडाउन की परिस्थिति में भी हम अपना काम रोकना नहीं चाहते हैं. हम हर हालत, हर स्थिति, हर परिस्थिति में अपने आंदोलन को लगातार जारी रखना चाहते हैं. इसलिए इस आंदोलन को इस विपरीत परिस्थिति में भी डिजिटल टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर वर्चुअल गुजरात राज्य का 34वां अधिवेशन कर रहे हैं. यह बात बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने 8 अगस्त 2020 को गुजरात के 34वें राज्य अधिवेशन के प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए कही. इस वर्चुअल राज्य अधिवेशन के का उद्घाटन डॉ.नवघण ओड़ेदरा (प्रिंसिपल एसएम जाडेजा, आर्ट्स एंड कामर्स कॉलेज कुतियाणा, पोरबंदर) ने किया. डॉ.प्रफुल्ल वसावा (राष्ट्रीय अध्यक्ष, आदिवासी टाइगर सेना), इजी. के एल पासी, रमण भाई परमार (बामसेफ जिला अध्यक्ष, अहमदाबाद) और अरूण जोगदिया (भारतीय युवा मोर्चा, राष्ट्रीय संयोजक) ने बारी-बारी से संबोधित किया.


राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा, कहा जाता है कि 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली. तथाकथित आजादी में जब अंग्रेज छोड कर चले गए तो उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाकर चले गए. जिस तरह से अंग्रेज लोग विदेशी थे उसी तरह से डीएनए के अनुसार ब्राह्मण भी विदेशी हैं. यानी विदेशी ब्राह्मण देश के हुक्मरान हो गए. ब्राह्मणों ने देश पर कब्जा किया और कब्जा करने के बाद इस कब्जे को मजबूत करने के लिए योजना बनाई कि हर चुनाव में ब्राह्मण लोग चुनाव जीत सकें. इस तरह से योजना बनाकर काम करते रहे. भारत के चुनाव में जितना भ्रष्टाचार हुआ है उतना भ्रष्टाचार दुनिया में कहीं पर भी नहीं हुआ है और नहीं होता है.


आगे कहा, 26 जनवरी 1950 संविधान लागू हुआ और आजाद भारत में 1952 को चुनाव हुआ. चुनाव में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 3.5 प्रतिशत ब्राह्मणों को 60 प्रतिशत टिकट दिया और 59 प्रतिशत ब्राह्मणों को जितवा कर लाया. और जो एससी, एसटी के 22.5 प्रतिशत लोग थे वह जॉइंट इलोक्ट्रेड से चुनकर आते थे उनके सामने उन लोगों को समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. क्योंकि जिनको टिकट देकर लाया गया था उन लोगों के पास फैसला लेने का अधिकार नहीं था. बल्कि ब्राह्मणों के पास फैसला लेने का अधिकार था. इसलिए उनके लिए फैसला लिया किएससी एसटी के जो इलेक्ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव है ये एससी, एसटी के नहीं है हमारे है. इस तरह से कांग्रेस के ब्राह्मणों का राज भारत में स्थापित किया गया.


वामन मेश्राम ने कहा, आज से 15 साल पहले जिस इलाके में आदिवासी निवास करते थे 11000 लाख करोड़ की धन संपदा जमीन के नीचे है. सेटेलाइट के द्वारा एक रिपोर्ट तैयार किया गया था, ऐसा रिपोर्ट भारत सरकार के पास था. यह आंकड़ा 11-20 साल पहले का है. आज उसकी कीमत कितने हजार लाख करोड़ हो गई होगी उसका कोई अंदाजा नहीं है. उस इलाके में कांग्रेस ने विकास का कार्यक्रम लागू किया और जहां जल, जंगल, जमीन जिस पर आदिवासियों का कब्जा था उस इलाके में इन लोगों ने डैम बनाएं आदिवासियों को विस्थापित कर दिया. क्योंकि आदिवासियों को विस्थापित किए बगैर यह हो नहीं सकता था इसलिए आजाद भारत में आदिवासियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया तो आदिवासियों को कांग्रेस की सरकारों ने नक्सलवादी घोषित कर उन लोगों को मारने का अभियान शुरू कर दिया.


उन्होंने कहा एक और बात समझना बहुत ज्यादा जरूरी है. कहा कि जो एमपी चुनकर जाते हैं जो मंत्री होते हैं वह बोलते क्यों नहीं? इसलिए नहीं बोलते क्योंकि 24 सितंबर 1932 को गांधी के द्वारा पूना पैक्ट केवल शेड्यूल कास्ट पर जबरदस्ती से लागू था. मगर जब संविधान में पांचवी और छठी अनुसूची आदिवासियों के लिए लागू की गई तो नेहरू ने और ब्राह्मणों ने सोचा की पांचवी और छठी अनुसूची के अनुसार आदिवासी के इलाके में स्वायत्त शासन लागू होगा और आदिवासी अपने स्वायत्त शासन के अधीन उस इलाके का राजा हो जाएंगे. ऐसी परिस्थिति में आदिवासियों को आजादी मिल जायेगी. जमीन के नीचे जो धन संपदा है उस धन संपदा के आदिवासी मालिक हो जाएंगे. तो योजना बनाकर पांचवी, छठी अनुसूची को प्रभाव शून्य करने के लिए आदिवासियों के एमएलए और एमपी और मंत्री चुनकर जाने के लिए उन्होंने जॉइन टू इलेक्ट्रेड जो पूना पैक्ट में शेड्यूल कास्ट के लिए लागू किया गया था वही ज्वाइन इलोक्ट्रेट आदिवासियों को भी लागू कर दिया.


उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा आदिवासियों ने जॉइंट इलोक्ट्रेट की मांग नहीं की मगर कांग्रेस के लोगों ने आदिवासियों के ऊपर जॉइंट इलोक्ट्रेट लागू कर दिया. कांग्रेस के द्वारा आदिवासियों के ऊपर थोपा गया और थोपने की वजह से यह परिणाम हुआ कि आदिवासियों से जो एमपी और मंत्री जुनकर जा रहे हैं विरोध नहीं कर पा रहे हैं.


वामन मेश्राम ने आगे कहा कि जॉइंट इलोक्ट्रेट से भी ज्यादा खतरनाक ईवीएम मशीन है. ब्राह्मणों की सारे देश भर में अलग-अलग पार्टियां है. कांग्रेस के विरोध में बीजेपी और बीजेपी के विरोध में कांग्रेस जाती है. दोनों के विरोध में कम्युनिस्ट पार्टी आती है. इस तरह से ब्राह्मणों की जितनी भी पार्टियां हैं उनकी आपस में सत्ता के लिए समझौता है. सत्ता के लिए वह आपस में लड़ाई झगड़ा करते हैं, मगर हम लोगों को गुलाम बनाए के लिए. उनकी नीति एक जैसी है यह बात हम सब लोगों को राजनीतिक रूप से समझने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है.


आर्थिक मंदी और मजदूरों की भूखमरी के मूल कारणों पर अपनी बात रखते हुए बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा 24 मार्च को भारत में सबसे पहले लॉकडाउन घोषित किया, लॉकडाउन घोषित करने के पीछे क्या मकसद था? भारत सरकार में अभी तक नहीं बताया. मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि जब कोरोना वायरस भारत में आया और भारत में पहला मरीज जनवरी 2020 में मिला. इसके बाद भी भारत सरकार जागृत नहीं हुई, बल्कि देश का प्रधानमंत्री डोनॉल्ड ट्रंप का स्वागत करने के लिए लाखों लोगों का कार्यक्रम अहमदाबाद में आयोजित किया. जबकि जनवरी में ही इसे रोकने के लिए तैयारी की जा सकती थी. लॉकडाउन 24 मार्च को क्यों घोषित किया गया? यह जानना बहुत जरूरी है.


उन्होंने कहा भारत में कानून बनाकर प्राइवेटाइजेशन लागू कर दिया गया. यह प्राइवेटाइजेशन सारे देश भर में हेल्थ केयर एरिया में भी लागू कर दिया गया. हेल्थ केयर कार्यक्रम के लिए बजट देने का कार्यक्रम बंद कर दिया गया. इससे देशभर में हेल्थ केयर का जो नेटवर्क था बर्बाद हो गया. हेल्थ केयर का जो ढाँचा था वह पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया. ऐसी परिस्थिति में महामारी भारत में आई, सरकार सोचा महामारी की कोई दवा तो है नहीं. महामारी से लोग बहुत बड़े पैमाने पर लाखों करोड़ों की संख्या में मर जाएंगे और सारी जिम्मेदारी भारत सरकार के ऊपर आएगी तो आनन-फानन में नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को लॉकडाउन घोषित कर दिया. क्योंकि बचाने के लिए हेल्थ केयर का कोई ढाँचा नहीं है. लोगों को अगर बचाना है तो बचाने के लिए हेल्थ केयर का ढाँचा होना चाहिए, इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए. इसलिए लॉकडाउन घोषित कर दिया कि सारे लोग अपने घर में रहे और जो सारा चैनल है वह नरेंद्र मोदी का समर्थन करने लगा. लॉकडाउन लगाने की वजह से मीडिया ने नरेंद्र मोदी को दुनिया का सबसे बड़ा नेता घोषित कर दिया.


वामन मेश्राम ने आरोप लगाते हुए कहा संकट निर्माण करने में कांग्रेस पहले नंबर पर दूसरे नंबर पर बीजेपी जिम्मेदार है. लॉकडाउन में फैक्ट्रियां बंद कर दी, प्रोडक्शन बंद कर दिया और प्रोडक्शन बंद करने की वजह से अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई. दूसरी बात निजीकरण की वजह से भारत में कोरोना का टेस्ट करने वाली एक भी किट नहीं थी. दूसरी तरफ मीडिया के द्वारा कोरोना का भय पैदा कर दिया गया भय पैदा करने की वजह से उन मजदूरों का पलायन अपने घरों की तरफ जाना शुरू हो गया. उन्होंने सोचा फ़ैक्टरियों में काम नहीं है, कंपनी मालिक मजदूरों को सैलरी देने के लिए तैयार नहीं है. उन्होंने सोचा जब सैलरी नहीं है तो अपने परिवार का पालन पोषण कैसे करें. यहां ऐसे मरने के बजाय अपने घर में मरे. जब वे अपने घर की तरफ पलायन करने लगे तो सरकार ने ट्रेनें बंद कर दी, सरकारी बसें बंद कर दिया, प्राइवेट बसें बंद कर दिया. सरकार ने हर प्रकार के साधन बंद कर दिए. परिणामतः मज़दूरों के पास अपने गांव के तरफ जाने का कोई साधन नहीं था तो मज़दूरों को कई-कई हजार किलोमीटर पैदल चलना पड़ा.


इतना भयंकर पलायन भारत के इतिहास में संभवत दुनिया के इतिहास में नहीं हुआ था. क्योंकि अमेरिका और यूरोप के लोगों ने लॉकडाउन घोषित नहीं किया. उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बंद करने का काम नहीं किया. इस तरह से यह षड्यंत्र हम लोगों को समझना बहुत जरूरी है. निजीकरण से हेल्थ केयर का प्राइवेटाइजेशन करने की वजह से पूरा हेल्थ केयर का ढांचा बर्बाद कर दिया. इस वजह से लॉकडाउन घोषित किया. लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था चौपट हो गई, अर्थव्यवस्था चौपट होने से उद्योग चौपट हो गए और मजदूरों को रोज़गार मिलना बंद हो गया. लगभग साढे 45 करोड़ लोगों का रोजगार केवल लॉकडाउन के समय बर्बाद हो गया. उनके सामने एक और भयंकर और बड़ी समस्या खड़ा कर दी गई कि उनको भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया गया और संगठित मजदूर थे उन लोगों को रोजगार बंद करने की वजह से भी भुखमरी का संकट उनके सामने खड़ा हो गया. इस तरह से अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई.


अंत में वानम मेश्राम ने कहा कि इसी दौरान लेवर लॉ को भी खत्म करने का अभियान चलाया गया, उस कानूनों को खत्म करने का भी षड्यंत्र किया गया. आरएसएस मोहन के भागवत ने कहा कि लॉकडाउन एक अवसर है. हाँ लॉकडाउन उनके लिए एक अवसर है वह अवसर मजदूरों के अधिकारों को खत्म करने का अवसर है, लॉकडाउन मजदूरों को सड़कों पर मारने का अवसर है, लॉकडाउन में सारे लोगों को सारे काम बंद करने के लिए रोका गया, मगर राम मंदिर बनाने के लिए अवसर है. राम मंदिर जिस जमीन पर बनाया जा रहा है वह बुद्ध भूमि है, राम जन्मभूमि नहीं है. उनके लिए भी अवसर है और जो वहां बुद्ध स्तूप है उसको जेसीबी चलाकर खत्म करने के लिए अवसर है. यह सारा का सारा करने के लिए अवसर है.

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