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रेलवे के निजीकरण से लाखों सरकारी नोकरियां होंगी खत्म

Published On :    7 Jul 2020   By : MN Staff
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भारतीय रेल 151 रेलगाड़ियों का परिचालन निजी क्षेत्र को सौपने जा रहा हैं. हालांकि इस निजीकरण के पीछे की वजह रेलवे को लेट-लतीफी से छुटकारा दिलाना, यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाना, यात्रियों को विश्वस्तरीय यात्रा का अनुभव प्रदान करना और सभी यात्रियों को कंफर्म टिकट उपलब्ध कराना बताया जा रहा हैं.



नई दिल्ली : भारतीय रेल 151 रेलगाड़ियों का परिचालन निजी क्षेत्र को सौपने जा रहा हैं. हालांकि इस निजीकरण के पीछे की वजह रेलवे को लेट-लतीफी से छुटकारा दिलाना, यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाना, यात्रियों को विश्वस्तरीय यात्रा का अनुभव प्रदान करना और सभी यात्रियों को कंफर्म टिकट उपलब्ध कराना बताया जा रहा हैं. लेकिन रेलवे के निजीकरण से लाखों नोकरियों पर खतरा मंडरा रहा है. कहा जा रहा हैं की रेलवे के निजीकरण से करीबन 3 लाख नौकरियां खत्म होगी और बाद में रेलवे की संपत्तियों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की कवायद की जाएगी.


चार महीने पहले नीति आयोग ने इसकी सिफारिश की थी. तब रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं बल्कि कुछ सेवाओं को निजी क्षेत्र के हवाले किया जाएगा. हालांकि रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का कहना है कि अप्रैल 2023 में निजी रेल सेवाएं शुरू हो जाएंगी और ये भारत के रेलवे नेटवर्क पर यात्री ट्रेनों के संचालन में निजी क्षेत्र के निवेश का पहला प्रयास है. इसके बाद रेलवे की जमीन और अन्य परिसंपत्तियां भी निजी क्षेत्र को सौंपने की कवायद की जाएगी. यह सुझाव नीति आयोग भी दे चुका है.


रेलवे के निजीकरण से सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां खत्म होंगी. 151 ट्रेनों के एलान के बाद रेलवे ने सभी मंडल रेल प्रबंधकों को पत्र जारी कर कहा है कि उन कर्मचारियों की सूची तैयार करें, जो 2020 की पहली तिमाही में 55 साल के हो गए या जिनकी सेवा अवधि के 30 साल पूरे हो गए. उन सभी को समय-पूर्व सेवानिवृत्ति का ऑफर दिया जाएगा. इनकी संख्या करीबन तीन लाख बताई जा रही है.



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निजीकरण होने पर निजी ट्रेनों को क्लियर सिग्नल मिलने और सरकारी ट्रेनों की लेट-लतीफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. ज्यादा असर रेलवे के किरायों की बढ़ोतरी के रूप में होगा. हालांकि, रेलवे का तर्क है इससे रेलवे में नई तकनीक आएगी, मरम्मत का खर्च घटेगा, यात्रा का समय कम होगा, नौकरियां बढ़ेंगी और यात्रियों को विश्व स्तरीय सुविधाएं मिलेंगी.


भारतीय रेलवे दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क का प्रबंधन करता है. भारतीय रेलवे को केंद्र सरकार सार्वजनिक कल्याण के लिए चलाती है ना कि लाभ कमाने के उद्देश्य से. भारत में रेल एक सार्वजनिक सेवा की तरह चलती रही है. सब्सिडी के जरिए सस्ती यात्रा की व्यवस्था हमेशा से भारतीय रेलवे की पहचान रही है. यही वजह रही की रेलवे की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी गई.



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अभी देश में 13 हजार ट्रेनें चल रहीं हैं और मांग एवं आपूर्ति के बीच समानता लाने करने के लिए सात हजार ट्रेनें और चलाई जाएंगी. अभी इन ट्रेनों का संचालन और प्रबंधन भारतीय रेल ही करता है. अब प्रबंधन के काम में निजी क्षेत्र कूदेगा. 151 रेलगाड़ियों के बारे में रेलवे ने कहा है कि वह 35 साल के लिए ये परियोजनाएं निजी कंपनियों को देगा. हालांकि, इन सभी ट्रेनों में ड्राइवर और गार्ड भारतीय रेलवे के होंगे.


बता दें कि जब रेलवे के निजीकरण की बात आती है तो अक्सर तेजस ट्रेनों का उदाहरण दिया जाता है. इन ट्रेनों को निजी परिचालन का अच्छा उदाहरण इसलिए नहीं माना जा सकता कि इसके लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई उसे वाजिब नहीं कहा जा सकता. न तो निविदाएं आमंत्रित की गईं, न कोई बोली लगी. रेलवे ने अपनी एक नई प्रीमियम ट्रेन का परिचालन सीधे तौर पर अपनी ही एक सहायक कंपनी को सौंप दिया. यह कहा जा सकता है कि तेजस के मामले में रेलवे ने जो किया वह ट्रेन को बाहरी हाथों में सौंपने का एक प्रयोग था.

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