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कानून बनने के बाद भी हॉकरों को कानूनी संरक्षण देने में राज्य सरकारे विफल

Published On :    6 Jun 2020   By : MN Staff
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सीसीएस के अध्ययन में चौकाने वाला खुलासा



नई दिल्ली : स्ट्रीट वेंडर यानी हॉकर के तौर पर रोजी-रोटी कमाने वालों को संरक्षण देने के लिए 6 साल पहले बने स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट को लागू करने में अधिकांश राज्य नाकाम रहे हैं. गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) के एक अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है. कानून को लागू करने में अनेक राज्यों का प्रदर्शन बहुत खराब है. आंध्र प्रदेश ने सबसे अच्छा काम किया, जबकि उत्तराखंड और हरियाणा सबसे पीछे हैं. सीसीएस के प्रशांत नारंग और जयना बेदी ने केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करके राज्यों के प्रदर्शन की तस्वीर पेश की है.


सीसीएस की इस साल की प्रोग्रेस रिपोर्ट के अनुसार स्ट्रीट वेंडर्स न सिर्फ असंगठित क्षेत्र के कामगारों में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था में भी बड़ा योगदान करते हैं. रोजमर्रा के जीवन में किफायती कीमत पर वस्तुएं खरीदने के लिए हम इन्हीं वेंडर्स के पास जाते हैं, फिर भी इनके प्रति सरकारों और स्थानीय निकायों का नजरिया आमतौर पर नकारात्मक ही रहा है. 


शहरों में सड़कों पर ट्रैफिक जाम, भीड़-भाड़ और गंदगी के लिए इन हॉकरों को जिम्मेदार मानकर उन्हें बड़ी आसानी से हटा दिया जाता है. कोई कानूनी संरक्षण न होने के कारण वे पुलिसिया उत्पीड़न, उगाही और रिश्वतखोरी के भी शिकार होते हैं. अनेक अदालती केसों के बाद आखिर 2014 में स्ट्रीट वेंडर एक्ट संसद से पारित हुआ. इसके बावजूद उन्हें संरक्षण और आजीविका चलाने का गरिमापूर्ण माहौल अभी तक नहीं मिल पाया है.



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कोरोना महामारी के दौर में असंगठित क्षेत्र के कामगार जिस तरह से संकट में आए हैं, ऐसे में यह कानून उनके लिए और अहम हो जाता है. सरकारें कल्याणकारी योजनाओं से उन्हें सीमित मदद ही कर सकती हैं. उन्हें वास्तविक दीर्घकालिक मदद तभी मिल सकती है जब गरिमापूर्ण तरीके से आजीविका चलाने के उनके अधिकार को सरकारें संरक्षण प्रदान करें. लेकिन वास्तविकता अलग दिखाई देती है. कानून लागू करने के मानकों के आधार पर तैयार किए गए इंडेक्स में असम,  उत्तराखंड, हरियाणा और मध्य प्रदेश सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्य हैं.



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केंद्रीय कानून के छह साल बाद भी तेलंगाना और उत्तराखंड ने नियमों की अधिसूचना जारी नहीं की है. छह राज्यों असम, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी और उत्तराखंड ने स्कीम की अधिसूचना जारी नहीं की है. संसद से पारित कानून के प्रकाश में राज्यों को स्कीम और उसके नियम बनाने हैं. हॉकरों की गणना के लिए सर्वे, सर्टिफिकेट देने के लिए पात्रता शर्तें और हॉकिंग जोन का निर्धारण किया जाना है. इसमें स्थानीय निकायों की भी बेरुखी दिखाई देती है. इसके लिए राज्य सरकारें ही उत्तरदायी हैं.


देश भर के वेंडरों की गिनती भी पूरी नहीं की जा सकी है. देश के १००० से ज्यादा शहरी स्थानीय निकायों ने अभी तक वेंडरों को चिन्हित करने के लिए सर्वे ही शुरू नहीं किया है. अधिकांश राज्यों ने चिन्हित वेंडरों की जो संख्या बताई है, वह वास्तविक वेंडरों की संख्या के मुकाबले एक फीसदी भी नहीं है.

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