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मडुवा बेचकर खरीदी हॉकी स्टिक

Published On :    16 Feb 2020   By : MN Staff
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हॉकी खिलाड़ी पुण्डी सारू अब ट्रेनिंग के लिए जा रही है अमेरिका



झारखंड :  यह सत्य है कि ब्राह्मणों ने मूलनिवासी बहुजनों को कभी भी अवसर नहीं दिया. लेकिन, जब-जब मूलनिवासी बहुजनां को चंद अवसर मिला है तब-तब उन्होंने एक नया इतिहास लिखा है. जरा सोचो पूरा अवसर मिलने के बाद क्या करेंगे? 


इतिहास भी इस बात का गवाह है कि मूलनिवासी बहुजनों ने हर क्षेत्र में नया इतिहास लिखकर देश और अपने समाज को गौरवांवित किया है. अब एक छोटी सी बच्ची ने इतिहास लिखकर साबित कर दिया है कि ब्राह्मणों से ज्यादा मूलनिवासियों में काबलियत है.


गौरतलब है कि झारखंड के घोर नक्सल प्रभावित जिला खूंटी के एक छोटे से गांव हेसल की रहने वाली कक्षा नौ की पुण्डी सारू ने एक सपना देखा था. सपना था हॉकी के मैदान में दौड़ते-दौड़ते सात समुद्र पार कर जाने की. 


अब पुण्डी के उस सपने को पंख लग चुका है. पुण्डी खूंटी के हेसल गांव से निकलकर सीधे अमेरिका जाने वाली है. लेकिन, पुण्डी के इस सपने के सच होनी की कहानी इतनी आसान नहीं रही, काफी स्ट्रगल भरा रहा है. क्योंकि उसे हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा है.


बता दें कि पुण्डी पांच भाई-बहन में दूसरे नंबर पर है. पुण्डी के अलावा तीन भाई और एक बहन है. बड़ा भाई सहारा सारू इंटर तक कि पढ़ाई कर छोड़ चुका है. पुण्डी नौंवी कक्षा की छात्रा है. पुण्डी की एक और बड़ी बहन थी जो अब नहीं रही. 



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पिछले साल मैट्रिक की परीक्षा में फेल हो जाने के कारण फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, उस वक्त पुण्डी टूट चुकी थी. दो महीने तक हॉकी से दूर रही. पुण्डी के पिता एतवा उराँव कुछ नहीं कर पाते. पहले वे दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे. 


मजदूरी करने के लिए हर दिन साइकिल से खूंटी जाते थे. 2012 में एक दिन साइकिल से लौटने के दौरान किसी अज्ञात वाहन ने टक्कर मारी दी, जिससे उनका हाथ टूट गया. प्लास्टर से हाथ जुट गया लेकिन, उसके बाद से मजदूरी करने लायक नहीं रहे.


तीन साल पहले जब पुंडी हॉकी खेलना शुरू की तो उसे अच्छे हॉकी स्टिक की जरूरत पड़ी. घर में खरीदने के लिए पैसे नहीं थे तब घर का मडुआ बेचा और छात्रवृति में मिले 1500 रुपया जोड़कर हॉकी स्टिक खरीदी. पुण्डी के पिता एतवा सारू घर में ही जानवरों को चराने का काम करते हैं. मां चंदू घर का काम करती है. 


घर का पूरा इकोनॉमी थोड़ी सी खेती और जानवरों के भरण पोषण और उसके खरीद बिक्री पर निर्भर है. पुण्डी पिछले तीन साल से हर दिन अपने गांव से आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर हारॅकी खेलने बिरसा मैदान खूंटी आती है. खूंटी में खेलते हुए पुण्डी कई ट्राफी जीत चुकी है. पुण्डी की ट्रेनर भी उसके मेहनत के कायल हैं. वो मैदान में खूब पसीना बहाती है.


अमेरिका जाने के लिए चयन होने के बाद पुण्डी कहती है. हॉकी खरीदने से लेकर मैदान में खेलने तक के लिए काफी जूझना पड़ा है. लेकिन, लक्ष्य सिर्फ अमेरिका जाना नहीं है हमें निक्की दीदी (भारतीय हॉकी टीम की सदस्य निक्की प्रधान) जैसा बनना है. देश के लिए हॉकी खेलना है. पुण्डी कहती है पहले पापा बोलते थे इतना खेलने में मेहनत कर रही हो क्या फायदा होगा? कुछ काम करो तो घर का खर्च भी निकलेगा, मां हमेशा सपोर्ट की है.


रांची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला और सिमडेगा की 107 बच्चियों को हॉकी कम लीडरशिप कैम्प रांची में एक प्रशिक्षण दिया गया. यह ट्रेनिंग यूएस कंसोलेट कलकत्ता द्वारा आयोजित था. सात दिनों में कैम्प में पांच बच्चियों का अमेरिका जाने के लिए चयन हुआ जिसमें पुण्डी का नाम भी शामिल है. अमेरिका के मीडलबरी कॉलेज में उसे हॉकी का प्रशिक्षण दिया जाएगा.

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