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फडणवीस सरकार में किसानों का रहा बुरा हाल

Published On :    15 Feb 2020   By : MN Staff
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विदर्भ के 58 फीसदी कर्जदार किसान मानसिक रूप से हो गए बीमार



विदर्भ : महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के 58 फीसदी किसान मानसिक रूप से बीमार हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंस (आईआईपीएस) नामक संस्था की ओर से कराए गए एक सर्वे की रिपोर्ट में हुआ है. रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि इन किसानों और उनके परिवारों के बीमार होने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वो है खेती के लिए कर्ज लेना. कर्ज के बोझ तले दबे ये किसान और उनके परिवार चिंता और अनिद्रा के शिकार हैं. संस्था की प्रियंका बोंबले ने उन 300 किसान परिवारों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है जिस परिवार के किसान ने आतमहत्या की थी.


किसानों और किसान परिवारों के बीमार होने के बारे में तत्कालीन बीजेपी सरकार को भी पता था. किसान आत्महत्या को रोकने के लिए कई सामाजिक संस्थाओं की ओर से यह मांग लगातार हो रही थी कि किसानों को मानसिक रूप से मजबूत किया जाए. इसलिए तत्कालीन देवेंद्र फडणवीस सरकार ने किसानों की काउंसिलिंग के लिए प्रेरणा प्रकल्प की शुरुआत वर्ष 2015 में की थी. लेकिन, यह प्रकल्प सफल नहीं हो पाया. क्योंकि सरकार खुद नहीं चाहती थी.


हालांकि, अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र विकास आघाड़ी सरकार ने सबसे पहले राज्य के कर्जदार किसानों की सुध ली और दो लाख तक कर्ज माफ करने की घोषणा के साथ राहत देने का काम किया है. बताया जा रहा है कि सरकार की ओर से किसानों के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले शेतकरी कर्ज मुक्ति योजना इसी साल मार्च में शुरू की जाएगी.


बता दें कि तत्कालीन फडणवीस सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2015 से 2018 तक 12021 किसानों ने आत्महत्या की. वहीं वर्ष 2019 में जनवरी से अप्रैल के बीच 808 किसानों ने आत्महत्या की थी. किसानों की आत्महत्या की घटनाएं सबसे ज्यादा विदर्भ से आई है, जबकि फडणवीस भी विदर्भ यानी नागपुर के ही हैं. 


सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर इन इलाकों में किसानों की मानसिक स्थिति को लेकर चर्चा होती रही है. लेकिन, इस दिशा में बीजेपी सरकार की ओर से ठोस कदम नहीं उठाए गए थे. अब आईआईपीएस संस्था की रिपोर्ट से भी यह संकेत मिलता है कि राज्य का स्वास्थ्य विभाग इन किसानों और किसान परिवारों के प्रति उदासीन रहा है. राज्य के मानिसक स्वास्थ्य विभाग के सहायक निदेशक डाक्टर दुर्योधन चव्हाण मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में मनोचिकित्सकों और काउंसिलिंग करने वालों की कमी है.



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आईआईपीएस की प्रियंका भी किसानों की आत्महत्या की वजह तलाशने के लिए 300 किसानों के पास गईं. क्योंकि, सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी ग्रामीण इलाकों में मानसिक समस्या को नजरअंदाज किया जाता रहा है और खासकर किसान समुदाय भी उपेक्षित रहता है. यही वजह है कि उन्होंने विदर्भ का यवतमाल जिला चुना. यह राज्य का ऐसा जिला है जहां सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. प्रियंका और उनकी टीम ने उन किसानों से बात की जो 30 हजार, 31 हजार, 60 हजार या उससे ज्यादा के कर्ज में डूबे हैं. कर्ज की वजह से 58 फीसदी किसान मानसिक रूप से बीमार पाए गए, जिनका मनोचिकित्सकों से इलाज कराना जरूरी माना जा रहा है.

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